Jaipur Rural Lok Sabha: BJP suffers loss due to low voting, Rao Rajendra Singh may get stuck in tough fight-m.khaskhabar.com
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जयपुर ग्रामीण लोकसभा : कम वोटिंग से भाजपा को नुकसान, कड़े संघर्ष में फंस सकते हैं राव राजेंद्र सिंह

khaskhabar.com: रविवार, 21 अप्रैल 2024 3:36 PM (IST)
जयपुर ग्रामीण लोकसभा : कम वोटिंग से भाजपा को नुकसान, कड़े संघर्ष में फंस सकते हैं राव राजेंद्र सिंह
- गिरिराज अग्रवाल - जयपुर। पहले चरण में राजस्थान की 12 सीटों पर वोट डाले जा चुके हैं और दूसरे चरण में 13 सीटों पर 26 अप्रैल को वोटिंग के लिए प्रचार जारी है। लेकिन, पहले चरण में हुई कम वोटिंग ने न केवल राजनीतिक दलों बल्कि लोकतंत्र में सच्ची आस्था रखने वाले हर व्यक्ति को अचंभे में डाल दिया है। सियासतदां अपने-अपने हिसाब से कम वोटिंग के मायने निकालने में जुटे हैं। हालांकि सत्तारूढ़ दल भाजपा अभी भी प्रचंड बहुमत का दावा कर रही है। लेकिन, सियासत को समझने वाले अधिकांश एक्सपर्ट्स का मानना है कि कम वोटिंग से हमेशा सत्तारुढ़ दल को नुकसान होता है। इसलिए कांग्रेस को लाभ हो सकता है। हालांकि कांग्रेस के प्रत्याशी अनिल चौपड़ा के सामने पहचान का बड़ा संकट है। इसलिए इस सीट पर भाजपा-कांग्रेस का कड़ा मुकाबला हो सकता है।
बात करें अगर जयपुर ग्रामीण लोकसभा की तो यहां चौंकाने वाली स्थिति है। ओवरऑल इस सीट पर वर्ष 2019 के 65.54 प्रतिशत की तुलना में इस बार केवल 56.58 प्रतिशत मतदान हुआ है, यानि 8.2 प्रतिशत कम वोट पड़े हैं। वह भी तब जबकि चुनाव आयोग से लेकर राजनीतिक दलों ने वोटरों को बूथ तक लाने के लिए तमाम उपाय किए हैं। यहां तक इस क्षेत्र में की गई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2 अप्रैल को हुई राजस्थान की पहली जनसभा और अन्य बड़े नेताओं के रोड शो आदि का कोई असर नजर नहीं आया। जबकि उन सभाओं में भारी भीड़ आने का दावा किया गया था। खास बात यह है कि इस लोकसभा की सभी 8 विधानसभा सीटों में एक भी सीट ऐसी नहीं है जहां मतदान प्रतिशत में 7.4 प्रतिशत से ज्यादा की कमी ना आई हो।
क्या भाजपा का ग्राफ गिर रहा है?
पहले चरण के वोटिंग प्रतिशत को देखकर तो कम से कम यही लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू कम होने के साथ ही भाजपा का ग्राफ अब गिर रहा है। क्योंकि भाजपा 10 साल से भारत की राजनीति में शीर्ष पर बनी हुई है। अधिक समय तक किसी के लिए शीर्ष पर बने रहना आसान नहीं होता। अगर पिछले चुनाव की बात करें तो यहां वर्तमान उद्योग एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह ऱाठौड़ ने 3 लाख 93 हजार 171 वोटों के भारी अंतर से चुनाव जीता था। उस समय उन्होंने अपने समकक्ष ओलंपियन कृष्णा पूनिया को करारी हार का स्वाद चखाया था।
इसके बाद विधानसभा चुनाव भी राज्यवर्धन राठौड़ ने अच्छे मतों से जीता। फिर क्या वजह रही कि उनके खुद के विधानसभा क्षेत्र झोटवाड़ा में सर्वाधिक 9.75 प्रतिशत और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष एवं कद्दावर नेता सतीश पूनिया के चुनाव क्षेत्र आंमेर में 10 प्रतिशत की वोटिंग कम हुई है। यह आंकड़ा कम चौंकाने वाला नहीं है। हालांकि पूनिया विधानसभा चुनाव हार गए थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राव राजेंद्र सिंह इस बार कड़े मुकाबले में फंस सकतेे हैं। क्योंकि दौसा का प्रभारी होने के कारण राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को दौसा और अन्य लोकसभा क्षेत्रों में ज्यादा समय देना पड़ा। वहीं पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया हरियाणा के प्रभारी बनने के कारण यहां दिखाई नहीं दिए। हालांकि उन्होंने विधानसभा चुनाव हारने के तुरंत बाद इस क्षेत्र से कुछ समय के लिए दूरी बनाने की घोषणा कर दी थी। पूर्व कैबिनेट मंत्री राजपाल सिंह शेखावत विधानसभा चुनाव में ही टिकट कटने के कारण नाराज होकर घर बैठ गए। ऐसा ही हाल कई अन्य नेताओं का भी रहा।
चुनाव में ना कोई लहर और ना ही कोई अंडर करंटः
जैसा कि अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पूरे देश में ही इस चुनाव को लेकर ना तो कोई लहर है और ना ही अंडर करंट जैसी कोई बात है। चुनाव पूरी तरह जातीयता और स्थानीय मुद्दों पर सिमट गया है। उम्मीदवार जीत के लिए पूरी तरह पीएम मोदी और अमित शाह पर निर्भऱ हैं। अगर जातिगत समीकरणों की बात करें तो राव राजेंद्र सिंह खुद राजपूत समुदाय से आते हैं। पूर्व सांसद और कैबिनेट मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ भी इसी समुदाय से हैं। फिर भी गुजरात के प्रकरण और भाजपा में राजघरानों वाले राजपूतों को ज्यादा तवज्जो मिलने से युवाओं में भाजपा के प्रति खासी नाराजगी देखी गई। राव राजेन्द्र भी राजघराने वाले बड़े ठिकानेदार हैं। राजपरिवार वाली छवि और आम राजपूत समुदाय से आने वालों के मध्य अब एक दीवार सी बन गई है। जिसका नुकसान पूरे राजस्थान में परिलक्षित होना दिखाई दे रहा है।
भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले औऱ बाद में यहां जल जीवन मिशन घोटाले को भ्रष्टाचार का बड़ा मुद्दा बनाया। लेकिन, उसमें अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से इस मुद्दे की हवा निकल गई। किसानों को एमएसपी की गारंटी और पीने के पानी की समस्या जयपुर ग्रामीण लोकसभा क्षेत्र में बड़ा मुद्दा है।
मूल भाजपाई कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी बड़ा कारणः
कम वोटिंग के लिए मूल भाजपाई कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी बड़ा कारण मानी जा रही है। क्योंकि ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है जब कांग्रेस और दूसरे दलों से आए नेताओं को पार्टी ज्यादा महत्व दे रही है। पहली बार देखने में आया है भाजपा मुख्यालय के दरवाजे पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए बंद से हो गए हैं। अगर कोई कार्यकर्ता मुख्यालय में जाता भी है तो प्रवेश करते ही पहले स्वागत कक्ष पर नाम, गांव, काम पूछने के साथ ही आईडी प्रूफ मांग लिया जाता है।
फिर कॉरपोरेट स्टाइल में अगर कोई बड़ा पदाधिकारी अंदर बैठा है, जिससे वह मिलने आया है तो जाने की इजाजत होती है, वरना बाहर से ही रवाना कर दिया जाता है। पार्टी नेताओं द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर की जाने वाली अनदेखी से भी कार्यकर्ता का मनोबल टूटा है। इसलिए आपसी बातचीत वे बोल ही देते हैं कि हमारी 400 सीटें आ तो रही हैं, फिर काम करने की क्या जरूरत है।

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