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बिल्डर की मनमानी पर RERA की स्ट्राइक: बिना OC कब्जा थोपना अवैध, अब खरीदार को मिलेगा मोटा ब्याज

यह मामला हरियाणा निवासी सतबीर सिंह से जुड़ा है, जिन्होंने जुलाई 2012 में 'एलीगेंट इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड' के प्रोजेक्ट में फ्लैट (H-102) बुक किया था। बिल्डर ने 3 साल के भीतर कब्जा देने का वादा किया था, जिसके अनुसार दिसंबर 2016 तक कब्जा मिल जाना चाहिए था। खरीदार ने करीब ₹28.50 लाख का भुगतान भी कर दिया, लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद भी उसे अपने घर की चाबियां नसीब नहीं हुईं। थक-हारकर आवंटी ने न्याय के लिए रेरा का दरवाजा खटखटाया।
बिल्डर ने बचाव में तर्क दिया कि प्रोजेक्ट काफी हद तक तैयार है और देरी के पीछे उनके नियंत्रण से बाहर के कारण थे। हालांकि, रेरा ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। बेंच ने व्यवस्था दी कि धारा 11(4)(b) के तहत यह प्रमोटर का वैधानिक दायित्व है कि वह कब्जा सौंपने से पहले सक्षम प्राधिकारी से ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट प्राप्त करे। बिना OC के कब्जा 'वैध कब्जा' नहीं माना जा सकता और किसी भी खरीदार को अधूरा या अवैध कब्जा लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने प्रमोटर की लापरवाही को गंभीर मानते हुए बिल्डर को निर्देश दिया गया है कि वह आवंटी द्वारा जमा की गई राशि (₹28,50,000) पर 10.80% वार्षिक दर से ब्याज दे। यह ब्याज दिसंबर 2016 से तब तक देय होगा जब तक बिल्डर वैध कब्जा ऑफर नहीं करता। बिल्डर को तुरंत ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट प्राप्त करने और उसके बाद ही कब्जे का वैध प्रस्ताव देने का आदेश दिया गया है। रेरा ने बिल्डर को इस आदेश के अनुपालन के लिए 45 दिनों का समय दिया है और 15 दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
यह आदेश उन तमाम बिल्डरों के लिए चेतावनी है जो अधूरी सुख-सुविधाओं और बिना सरकारी प्रमाण पत्र के खरीदारों को कब्जे का नोटिस थमा देते हैं। रेरा ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून की नजर में 'होम बायर' की संतुष्टि और वैधानिक औपचारिकताएं सर्वोपरि हैं।
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