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सफलता की कहानीः पहले सीजन में ही 50 हजार से अधिक की आय, उपदान के लिए सरकार का जताया आभार

ड्रैगन फ्रूट को ‘सुपर फ्रूट’ कहा जाता है, लेकिन इसके स्वाद और औषधीय गुणों के प्रति अभी भी आम लोगों में पर्याप्त जागरूकता नहीं है। वे स्वयं इसके स्वास्थ्य लाभ के प्रति लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि ड्रैगन फ्रूट बिना फ्रिज के भी लगभग दो महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है। प्राकृतिक खेती को प्राथमिकता देते हुए प्रेम चन्द किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक अथवा कीटनाशक का प्रयोग नहीं करते। उनके खेतों में ड्रैगन फ्रूट के साथ-साथ सीताफल और पपीता जैसे अन्य फलदार पौधे भी लहलहा रहे हैं। उनका बेटा अर्जुन शर्मा भी इस खेती कार्य में सक्रिय सहयोग कर रहा है।
उद्यान विभाग की ओर से मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर योजना (एमआईडीएच) के अंतर्गत 2.5 बीघा भूमि पर ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए उन्हें कुल 62 हजार रुपये की सब्सिडी स्वीकृत की गई है। पहली किस्त के रूप में 38 हजार रुपये उनके खाते में जमा हो चुके हैं। साथ ही प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत उन्हें ड्रिप सिंचाई की सुविधा भी उपलब्ध करवाई गई। इस पर कुल 25 हजार रुपये का खर्च आया, जिसमें से 80 प्रतिशत अर्थात 20 हजार रुपये की सब्सिडी सरकार द्वारा प्रदान की गई। प्रेम चन्द ने अपनी कृषि में सफलता के लिए बागवानी विभाग व प्रदेश सरकार का आभार जताया।
विषयवाद विशेषज्ञ, सरकाघाट डॉ. अनिल ठाकुर ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट की खेती से किसानों को कम समय में बेहतर उत्पादन और अच्छा बाजार मूल्य प्राप्त हो रहा है। यह कैक्टस प्रजाति की फसल है, जो 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है, इसलिए जिले के गर्म क्षेत्रों में इसे बढ़ावा दिया जा रहा है।
क्षेत्र विस्तार योजना के अंतर्गत ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए किसानों को प्रति हेक्टेयर 3 लाख 37 हजार 500 रुपये तक का उपदान दो किस्तों में प्रदान किया जाता है। पहली किस्त 60 प्रतिशत होती है। विभाग द्वारा ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलर और रेनगन जैसी आधुनिक सिंचाई प्रणालियों पर भी अनुदान उपलब्ध करवाया जा रहा है।
उद्यान विकास अधिकारी डॉ. विपिन ने बताया कि सरकाघाट क्षेत्र में ड्रैगन फ्रूट की खेती किसानों के लिए आय का एक प्रभावी और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रही है। प्रेम चन्द जैसे प्रगतिशील किसानों ने यह दर्शाया है कि विभागीय योजनाओं, तकनीकी मार्गदर्शन और प्राकृतिक खेती के माध्यम से कम भूमि में भी बेहतर आमदनी प्राप्त की जा सकती है।
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