हिमाचल प्रदेश : लाहौल-स्पीति में प्रस्तावित दो जलविद्युत प्रोजेक्ट पर कड़ी आलोचना का सामना कर रही राज्य सरकार

इन परियोजनाओं का उद्देश्य हिमाचल प्रदेश के समृद्ध जलविद्युत संसाधनों का दोहन करके तेलंगाना की अक्षय ऊर्जा क्षमता को बढ़ाना है। हालांकि, इस कदम ने लाहौल-स्पीति के नाजुक, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में तनाव पैदा कर दिया है।
'लाहौल-स्पीति एकता मंच' के बैनर तले स्थानीय नेताओं ने सरकार के समझौते को रद्द नहीं करने पर बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू करने की कसम खाई है। मंच के संयोजक रिग्जिन हेरप्पा ने कड़ी असहमति जताते हुए कहा, "हिमाचल सरकार लाहौल-स्पीति के अस्तित्व को मिटाने पर आमादा है। हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। लोग अपनी जमीन, पर्यावरण और जीवन शैली की रक्षा के लिए निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार हैं।"
'लाहौल-स्पीति बचाओ', 'चंद्रभागा संघर्ष समिति' और स्पीति सिविल सोसाइटी समेत कई संगठनों के प्रतिनिधि विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए हैं। 'लाहौल-स्पीति बचाओ' के बीएस राणा, प्रेम चंद कटोच, विक्रम कटोच और प्रेम लाल योतेरपा जैसे प्रमुख लोगों के साथ-साथ कुंगा बोध, सचिन मेरुपा और राम गौर जैसे अन्य लोगों ने सरकार के फैसले की कड़ी निंदा की है।
एकता मंच के एक प्रमुख सदस्य तेनजिन कटोच ने इसमें शामिल जोखिमों पर जोर दिया, "लाहौल-स्पीति हिमाचल प्रदेश का एकमात्र जिला बचा है जहां नदियां स्वतंत्र रूप से बहती हैं। क्षेत्र की नाजुक भूगर्भीय संरचना इसे बड़े पैमाने पर जलविद्युत परियोजनाओं के लिए अनुपयुक्त बनाती है। हम नहीं चाहते कि लाहौल-स्पीति दूसरा उत्तराखंड या किन्नौर बन जाए, जहां ऐसी परियोजनाओं ने पर्यावरण और स्थानीय आजीविका को तबाह कर दिया है।"
तेंजिन कटोच ने कहा, "अगर सरकार पुनर्विचार करने से इनकार करती है तो हम भूख हड़ताल और धरना आयोजित करने से नहीं हिचकिचाएंगे। हमारा मानना है कि हिमाचल सरकार के पास अभी भी इस फैसले को पलटने का मौका है।"
रिग्जिन हेरप्पा ने चेतावनी दी, "अगर सरकार एमओयू रद्द नहीं करती है, तो हम एक बड़ा आंदोलन शुरू करेंगे। लाहौल-स्पीति का हर घर अपनी जमीन, नदियों और संस्कृति की रक्षा के लिए एकजुट होगा।"
--आईएएनएस
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