Himalayan Diamond Blooms at 4,000 Meters; Flowers Only Once Every 7 to 15 Years-m.khaskhabar.com
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4,000 मीटर की ऊंचाई पर खिलता है 'हिमालयी हीरा', 7 से 15 साल में सिर्फ एक बार आता है फूल

khaskhabar.com: शनिवार, 01 अगस्त 2026 12:53 PM (IST)
4,000 मीटर की ऊंचाई पर खिलता है 'हिमालयी हीरा', 7 से 15 साल में सिर्फ एक बार आता है फूल
प्रकृति अपने अनोखे और दुर्लभ चमत्कारों से समय-समय पर लोगों को हैरान करती रहती है। इन दिनों सोशल मीडिया पर हिमालय के ऊंचे पहाड़ी इलाकों का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक बेहद दुर्लभ और विशालकाय फूल लोगों का ध्यान खींच रहा है। अपनी अनोखी बनावट और दुर्लभता के कारण इसे लोग 'हिमालयी हीरा' या 'डायमंड फ्लावर' कह रहे हैं। क्या है 'हिमालयी हीरा'? सोशल मीडिया पर जिस पौधे को 'डायमंड फ्लावर' कहा जा रहा है, उसका वैज्ञानिक नाम रियम नोबाइल (Rheum nobile) है। स्थानीय क्षेत्रों में इसे पदमचाल या केन्जो के नाम से भी जाना जाता है। इसकी पारदर्शी और चमकदार संरचना इसे अन्य पौधों से बिल्कुल अलग बनाती है, यही वजह है कि इसे 'हिमालयी हीरा' की उपाधि मिली है।
जीवन में सिर्फ एक बार खिलता है फूल
इस पौधे की सबसे अनोखी विशेषता इसका जीवन चक्र है। जहां अधिकांश पौधे हर साल फूल देते हैं, वहीं रियम नोबाइल अपने पूरे जीवन में केवल एक बार ही फूल देता है। इस प्रक्रिया में करीब 7 से 15 साल का समय लग सकता है। फूल खिलने के बाद धीरे-धीरे पौधे का जीवन चक्र समाप्त होने लगता है।
ऊंचाई में इंसान को भी दे सकता है टक्कर
यह दुर्लभ पौधा अपनी लंबाई के लिए भी जाना जाता है। इसकी ऊंचाई लगभग 3.2 फीट से 6.5 फीट तक पहुंच सकती है। वायरल वीडियो में यह पौधा पहाड़ों के बीच इंसानों के बराबर या उनसे भी ऊंचा दिखाई देता है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है।
13 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर होता है विकसित
रियम नोबाइल सामान्य स्थानों पर नहीं उगता। यह हिमालय के दुर्गम और ठंडे इलाकों में समुद्र तल से लगभग 4,000 मीटर (करीब 13,000 फीट) या उससे अधिक ऊंचाई पर पाया जाता है। कम ऑक्सीजन और बेहद कम तापमान जैसी कठिन परिस्थितियों में भी इसका विकसित होना प्रकृति का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।
वीडियो के बाद संरक्षण की उठी मांग
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कुछ लोग इस दुर्लभ पौधे को छूते और तोड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसे लेकर पर्यावरण प्रेमियों और सोशल मीडिया यूजर्स ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि इतने दुर्लभ पौधों को नुकसान पहुंचाने के बजाय उनका संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी प्रकृति के इस अनमोल उपहार को देख सकें।

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