योगीराज में पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल, भ्रष्टाचार उजागर करने की सजा जेल

हालांकि, स्थानीय पत्रकारों और समाजसेवियों का कहना है कि यह आरोप पूरी तरह झूठा और बेबुनियाद है। दीपक पंडित भ्रष्टाचार के खिलाफ बेखौफ रिपोर्टिंग कर रहे थे और उन्होंने करोड़ों के घोटाले का पर्दाफाश किया था, जिससे सरकारी महकमों में हलचल मच गई थी।
पत्रकारों का कहना है कि सरकारी अधिकारियों और पुलिस की मिलीभगत से दीपक पंडित को झूठे केस में फंसाया गया है। यही हाल कुछ समय पहले मोहाली के पत्रकार राघवेंद्र वाजपेई का भी हुआ था, जिन्होंने भ्रष्टाचार उजागर किया था और बाद में सरकारी दबाव का शिकार हो गए।
लखीमपुर के पत्रकारों ने इस मामले को लेकर उच्च अधिकारियों से न्याय की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने भी उनकी मदद नहीं की। अब पत्रकार संगठनों और समाजसेवियों ने सरकार को चेतावनी दी है कि अगर झूठे मुकदमे वापस नहीं लिए गए, तो वे बड़े आंदोलन की तैयारी करेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम पर पत्रकार संगठनों और समाजसेवियों का कहना है कि यदि पत्रकार भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट नहीं हुए, तो एक-एक कर सभी का नंबर आएगा। उन्होंने सरकार को चेताया कि अगर पत्रकारों की स्वतंत्रता पर इस तरह की पाबंदी जारी रही, तो इसका खामियाजा आने वाले चुनावों में भुगतना पड़ेगा।
इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है – क्या अब निष्पक्ष पत्रकारिता करना अपराध बन चुका है? उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर बढ़ते हमलों से यह साफ है कि सरकार और प्रशासन असहज सवालों से बचने के लिए कलमकारों पर बंदिशें लगाने में जुटे हैं। ऐसे में अब देखना होगा कि क्या सरकार पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता की रक्षा करेगी या फिर उन्हें जेल में डालने की परंपरा जारी रखेगी?
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