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पंचायती राज चुनावों की पंचायती : आरक्षण लॉटरी स्थगित होते ही वायरल हुआ फर्जी पत्र, निकाय नतीजों के बाद टालमटोल पर घिरी सरकार

khaskhabar.com: मंगलवार, 15 सितम्बर 2026 11:33 PM (IST)
पंचायती राज चुनावों की पंचायती : आरक्षण लॉटरी स्थगित होते ही वायरल हुआ फर्जी पत्र, निकाय नतीजों के बाद टालमटोल पर घिरी सरकार
जयपुर। राजस्थान में 305 शहरी निकायों में अध्यक्ष पद के नामांकन की गहमागहमी के बीच ग्रामीण लोकतंत्र की चौखट पर गहरा असमंजस छा गया है। नगर निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष के बीच 1% से भी कम वोट शेयर के बारीक अंतर और कई निकायों में फंसी खींचतान के बीच पंचायती राज चुनावों के पहले चरण—आरक्षण लॉटरी प्रक्रिया—को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है। इस स्थगन के तुरंत बाद नई तारीखों का ऐलान करने वाले एक कथित 'आधिकारिक पत्र' के वायरल होने और फिर राज्य निर्वाचन आयोग व सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (DIPR) द्वारा उसे 'फर्जी' करार दिए जाने से प्रशासनिक मशीनरी की साख और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरक्षण लॉटरी पर अचानक ब्रेक और फर्जी पत्र का बवंडर पंचायती राज संस्थाओं के लिए 17 और 18 सितंबर को आरक्षण व लॉटरी की प्रक्रिया तय की गई थी। ग्रामीण जनप्रतिनिधियों और दावेदारों की निगाहें इसी पर टिकी थीं कि किस ग्राम पंचायत या पंचायत समिति में कौन सा वर्ग आरक्षित होगा। ऐन वक्त पर इस प्रक्रिया को स्थगित करने के आदेश जारी हुए।
अभी इस स्थगन पर प्रशासनिक हलकों में चर्चा चल ही रही थी कि पंचायती राज विभाग के नाम से हूबहू दिखने वाला एक आदेश सोशल मीडिया पर तैरने लगा, जिसमें नई तारीखों का ऐलान किया गया था। चंद घंटों के भीतर राज्य निर्वाचन आयोग और सूचना जनसंपर्क विभाग को आगे आकर स्पष्टीकरण देना पड़ा कि ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ है और यह पत्र पूरी तरह फर्जी व भ्रामक है। लेकिन सवाल यह उठता है कि संवेदनशील चुनावी प्रक्रिया के बीच ऐसा पत्र सरकारी महकमों की सील-मुहर की तर्ज पर बाहर कैसे आया और इसे रोकने में साइबर निगरानी तंत्र क्यों नाकाम रहा?
'एक राज्य, एक चुनाव' का नारा बनाम टलते पंचायत चुनाव
राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषकों का मानना है कि निकाय चुनावों में शहरी मतदाताओं के कड़े इम्तिहान के बाद सत्ता पक्ष ग्रामीण अंचल में किसी बड़े जोखिम से बचना चाहता है।
नारे और हकीकत का विरोधाभास: एक ओर 'एक राज्य, एक चुनाव' (वन स्टेट, वन इलेक्शन) के बड़े-बड़े सियासी दावे किए जा रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत यह है कि निकायों के समानांतर पंचायत चुनाव कराने की तय प्रक्रिया तक रोक दी गई।
हार का खौफ या रणनीतिक ठहराव: विपक्ष का सीधा आरोप है कि शहरी वार्डों में निर्दलीयों और विपक्ष की कड़ी टक्कर से सहमी सरकार अब ग्रामीण क्षेत्रों के संभावित जनाक्रोश का सामना करने से कतरा रही है। चुनावी प्रक्रिया के शुरुआती चरण (लॉटरी) को ही ठंडे बस्ते में डालना इस बात का संकेत है कि सरकार अभी पंचायतों के रण में उतरने की मानसिक स्थिति में नहीं है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बंधक बनाने के आरोप
गांवों की सरकार चुनने के इंतजार में बैठे लाखों मतदाताओं और हजारों भावी उम्मीदवारों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पंचायत चुनाव समय पर होंगे या कानूनी और प्रशासनिक अड़चनों की आड़ में इन्हें लंबा टाला जाएगा? लोकतंत्र में जनता के फैसले से बचने के लिए प्रशासनिक आदेशों और तारीखों को बदला जा सकता है, मगर जनता के सवालों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। आरक्षण लॉटरी का टलना और उसके बाद उपजा प्रशासनिक भ्रम यह साबित करने के लिए काफी है कि पंचायती राज व्यवस्था इस समय नीतिगत अनिर्णय और सियासी नफा-नुकसान के भंवर में फंसी हुई है।

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