भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा की नई कार्यकारिणी : क्या यह महज सांगठनिक रस्म है या वास्तविक हिस्सेदारी की शुरुआत?

इस कार्यकारिणी की सबसे बड़ी विशेषता—या कहें कि असंतुलन—यह है कि इसमें जयपुर संभाग (विशेषकर जयपुर शहर) को अत्यधिक महत्व दिया गया है.
शीर्ष पदों पर कब्जा : संगठन के चाबूक कहे जाने वाले मुख्य पद जयपुर के पास हैं; जैसे प्रदेश महामंत्री जंगबहादुर पठान (जयपुर उत्तर), प्रदेश उपाध्यक्ष सरदार रणधीर सिंह (जयपुर देहात दक्षिण), प्रदेश मंत्री प्रफुल जैन (जयपुर शहर) और प्रदेश कोषाध्यक्ष फरमान कुरैशी (जयपुर शहर).
विभागों में बहुलता : मीडिया, सोशल मीडिया, आईटी, और नीति एवं शोध जैसे महत्वपूर्ण आंतरिक विभागों के प्रभारियों और सह-प्रभारियों की सूची में मनसुफ खान, फरीदुद्दीन शेख, मोहम्मद इरशाद, मोनिका जैन और ऋषभ जैन जैसे जयपुर के चेहरों की भरमार है.
हालांकि, राजधानी होने के नाते सांगठनिक गतिविधियों के संचालन के लिए जयपुर के कार्यकर्ताओं को तवज्जो मिलना स्वाभाविक माना जा सकता है, लेकिन जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर या कोटा जैसे सुदूर संभागों के जमीनी कार्यकर्ताओं में इससे यह संदेश जा सकता है कि शीर्ष नेतृत्व के करीब रहने वालों को ही तरजीह दी जाती है.
सामाजिक ताना-बाना : 'सर्व-अल्पसंख्यक' का संदेश देने की कोशिश
भाजपा ने इस सूची के माध्यम से यह साबित करने का प्रयास किया है कि उसके लिए 'अल्पसंख्यक' का दायरा केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं है:
सिख और जैन समाज को प्रतिनिधित्व: मुस्लिम चेहरों की स्वाभाविक बहुलता के बीच सिख समाज से सरदार रणधीर सिंह को उपाध्यक्ष और सरदार विजेन्द्र पाल सिंह को सह-प्रभारी जैसी जिम्मेदारियां दी गई हैं. वहीं, जैन समाज से संजीव भटेवड़ा (ब्यावर) को उपाध्यक्ष और प्रफुल जैन को मंत्री बनाने के साथ-साथ कई युवाओं को विभागीय प्रभार सौंपे गए हैं.
यह रणनीति भाजपा के 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे के अनुकूल है, ताकि अल्पसंख्यक मामलों में पार्टी पर केवल एकतरफा राजनीति के आरोप न लगें.
औपचारिकता बनाम वास्तविक भागीदारी : यक्ष प्रश्न
सबसे बड़ा और निष्पक्ष सवाल यही है कि क्या इस मोर्चे के गठन से अल्पसंख्यक कार्यकर्ताओं को कभी वास्तविक सत्ता का लाभ मिल पाएगा?
पारंपरिक भूमिका : राष्ट्रीय स्तर पर शहजाद पूनावाला, सैयद जफर इस्लाम या शाहनवाज हुसैन जैसे चेहरे मीडिया में पार्टी का पक्ष मजबूती से रखते हैं और विपक्षी दलों के तुष्टिकरण पर निशाना साधते हैं. लेकिन जब बात जमीनी स्तर पर टिकट वितरण (विधानसभा या लोकसभा) की आती है, तो भाजपा का झुकाव अपने कोर-वोटर और 'जीतने की क्षमता' (Winnability) की तरफ ही रहता है.
चुनौती : वर्तमान राज्य सरकार और भाजपा नेतृत्व के सामने यह परीक्षा होगी कि क्या यह नई टीम केवल रैलियों में भीड़ जुटाने और सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार की 'औपचारिकता' तक सीमित रहेगी, या फिर इसके कर्मठ चेहरों को विभिन्न बोर्डों, निगमों, अकादमियों (जैसे वक्फ बोर्ड, उर्दू अकादमी) में अध्यक्ष या सदस्य बनाकर सत्ता का वास्तविक सुख दिया जाएगा.
प्रदेश अध्यक्ष हमीद खान मेवाती का यह दावा अपनी जगह सही हो सकता है कि उन्होंने सुदूर जिलों (जैसे बांसवाड़ा, जैसलमेर, धौलपुर) से भी नाम शामिल कर राज्य को कवर किया है. लेकिन इस टीम की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि सूची कितनी बड़ी है, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि भाजपा का मुख्यधारा का नेतृत्व इस मोर्चे के इनपुट और इसके कार्यकर्ताओं की मेहनत को कितनी गंभीरता और सम्मान देता है.
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