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जिला प्रमुख के पद बढ़े पर ओबीसी सीटें क्यों नहीं? राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

कोर्ट ने कहा कि 2020 में 33 जिला प्रमुख पदों में से 5 पद ओबीसी उम्मीदवारों के लिए आरक्षित थे, लेकिन कुल पदों की संख्या बढ़कर 41 होने के बाद भी ओबीसी आरक्षित पदों की संख्या 5 पर ही बनी हुई है। कोर्ट ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा कि ओबीसी प्रतिनिधित्व को आनुपातिक रूप से क्यों नहीं बढ़ाया गया।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को पंचायती राज विभाग का प्रतिनिधित्व कर रहे एडिशनल एडवोकेट जनरल और सरकारी वकील को याचिका की एक कॉपी देने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर को होगी।
याचिकाकर्ता के वकील अरविंद शर्मा और आनंद शर्मा ने दलील दी कि जिलों के पुनर्गठन और नए जिलों के बनने के बाद जिला प्रमुख पदों की संख्या 33 से बढ़कर 41 हो गई है। कुल पदों की संख्या में वृद्धि के साथ लागू नियमों के तहत ओबीसी आरक्षण की फिर से गणना होनी चाहिए थी।
उन्होंने जिला प्रमुख पदों के लिए ओबीसी आरक्षण की नए सिरे से गणना की मांग की है, जबकि कुल आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा के भीतर रखा जाए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया है कि पंचायती राज व्यवस्था में ओबीसी उम्मीदवारों को निष्पक्ष और आनुपातिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
याचिका में ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिका के अनुसार, सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है। याचिकाकर्ताओं ने मीडिया रिपोर्टों का भी हवाला दिया है, जिसमें कहा गया है कि सरकार खुद भी रिपोर्ट को पूरी तरह से सटीक नहीं मानती है। रिपोर्ट को सरकार ने अभी तक सार्वजनिक नहीं किया है।
याचिकाकर्ताओं ने लगभग 16 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण देने के आधार पर भी सवाल उठाया है और तर्क दिया है कि अनुपात अधिक होना चाहिए। उन्होंने बताया कि 2020 में ओबीसी के लिए 18 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था और तर्क दिया कि उनकी गणना के आधार पर 41 पदों में से ओबीसी आरक्षित जिला प्रमुख पदों की संख्या बढ़कर 7 होनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने अभी तक इन दावों पर कोई फैसला नहीं दिया है और आगे बढ़ने से पहले सरकार से जवाब मांगा है।
--आईएएनएस
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