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मूवी रिव्यू : द इंडिया स्टोरी– कमजोर पटकथा और बोझिल अदालती जंग ने घटाया असर

फिल्म की कहानी पुणे में रहने वाले योगेश पाटिल के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी छोटी बेटी परी कैंसर से दम तोड़ देती है। बेटी की मौत के बाद योगेश का दावा है कि उसकी मृत्यु केवल बीमारी से नहीं, बल्कि जहरीले रसायनों और कीटनाशकों से दूषित भोजन के कारण हुई है।
जब पुलिस उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लेती और कई वकील उसका साथ देने से इनकार कर देते हैं, तब अधिवक्ता अर्चना इस मामले को अपने पहले मुकदमे के रूप में स्वीकार करती हैं। मामला उच्च न्यायालय पहुंचता है, जहां सरकार, कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों और खेती की वर्तमान व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए जाते हैं। इसके बाद शुरू होती है न्याय, व्यवस्था और समाज के बीच एक लंबी कानूनी लड़ाई।
सशक्त कहानी, पटकथा कमजोर
फिल्म का मूल विचार बेहद सशक्त और सोचने पर मजबूर करने वाला है। यह ऐसा विषय है जिस पर चर्चा होना आवश्यक है। अफसोस की बात यह है कि इतनी मजबूत कहानी को जिस स्तर की पटकथा की जरूरत थी, वह फिल्म को नहीं मिल पाई।
अदालती बहसों में वह तीखापन नजर नहीं आया जिसकी उम्मीद इस तरह की फिल्मों से की जाती है। विशेष रूप से अदालत में वकीलों द्वारा बोले गए संवाद कई जगह तो अच्छे हैं लेकिन वे ऐसे नहीं है जिन पर दर्शक तालियाँ बजाने को मजबूर हो जाएं।साथ अदालती कार्रवाई के कई दृश्य केवल औपचारिकता निभाते हुए आगे बढ़ते दिखाई देते हैं।
कमजोर निर्देशन
निर्देशक चेतन डी. के. ने एक साहसिक विषय चुना है और इसके लिए उनकी सराहना की जानी चाहिए। हाल के समय में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और मिलावट को लेकर देशभर में जिस तरह चर्चाएं तेज हुई हैं, उसके बीच यह फिल्म प्रासंगिक भी लगती है।
फिर भी निर्देशन कई स्थानों पर कमजोर पड़ जाता है। अदालत के दृश्य पर्याप्त रोमांच पैदा नहीं कर पाते। जहां तनाव और नाटकीयता की आवश्यकता थी, वहां घटनाएं सामान्य गति से गुजर जाती हैं। परिणामस्वरूप फिल्म कई बार दस्तावेजी प्रस्तुति जैसी महसूस होने लगती है।
कुछ दृश्य छोड़ते हैं गहरी छाप
फिल्म में कुछ ऐसे दृश्य जरूर हैं जो लंबे समय तक याद रहते हैं। विशेष रूप से वह दृश्य, जिसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी यह जानकर स्तब्ध रह जाता है कि दूध उत्पादन में किस प्रकार अनैतिक तरीके अपनाए जा रहे हैं। इसके बाद उसका अपने परिवार को याद करना दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है।
इसी तरह एक किसान द्वारा यह स्वीकार करना कि वह अपने परिवार के लिए अलग फसल उगाता है, जबकि बाजार में दूसरी उपज बेचता है, फिल्म के सबसे प्रभावशाली दृश्यों में शामिल है। परी की बीमारी और उसके दर्द को दिखाने वाले दृश्य भी भावनात्मक असर छोड़ते हैं।
नहीं था अदालती दृश्यों में दम
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका अदालती घटनाक्रम है। जिस मुकदमे को पूरी फिल्म का केंद्र बनाया गया है, उसमें न तो बहसों का अपेक्षित रोमांच दिखाई देता है और न ही कानूनी टकराव की तीव्रता।
विपक्ष का वकील मजबूत दलीलें देता जरूर है, लेकिन उसके पक्ष की ओर से गवाहों का अभाव कहानी को कमजोर करता है। बड़े औद्योगिक समूहों को भी अपेक्षित मजबूती के साथ नहीं दिखाया गया। वे केवल बैठकों में चिंता व्यक्त करते नजर आते हैं, जबकि वास्तविकता में ऐसे मामलों में कहीं अधिक आक्रामक कानूनी रणनीति देखने को मिलती है।
फिल्म के मध्यांतर से पहले आने वाला मोड़ दिलचस्प है, लेकिन उसके बाद कुछ घटनाएं तर्कसंगत नहीं लगतीं। इससे कहानी की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
दमदार अभिनय
श्रेयस तलपड़े ने संयमित और बेहद ईमानदार अभिनय किया है। पहले हिस्से में उनका किरदार अपेक्षाकृत शांत रहता है, लेकिन मध्यांतर के बाद वह पूरी फिल्म का भावनात्मक केंद्र बन जाते हैं। कई दृश्यों में उनका अभिनय दर्शकों को भावुक कर देता है।
काजल अग्रवाल एक दृढ़ निश्चयी अधिवक्ता के रूप में प्रभाव छोड़ती हैं। उनका आत्मविश्वास और स्क्रीन उपस्थिति किरदार को विश्वसनीय बनाती है। बाल कलाकार तृषा शारदा ने कठिन भूमिका को सहजता से निभाया है और वह फिल्म की भावनात्मक धुरी बनकर उभरती हैं।
मुरली शर्मा और मनीष वाधवा अपने अनुभव के अनुरूप अच्छा काम करते हैं। न्यायाधीशों की भूमिका निभाने वाले कलाकार भी संतोषजनक प्रदर्शन करते हैं। कुछ छोटे किरदार सीमित समय में प्रभाव छोड़ते हैं, जबकि कुछ अनुभवी कलाकारों को पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाया।
संगीत और तकनीकी पक्ष
फिल्म का संगीत निराश करता है। कोई भी गीत ऐसा नहीं बन पाया जो फिल्म खत्म होने के बाद याद रह जाए। पार्श्व संगीत औसत है और कई जगह अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाता।
छायांकन कहानी की जरूरत के अनुरूप है, जबकि सेट और वेशभूषा यथार्थ का अनुभव कराते हैं। एडिटिंग भी कमजोर हैं। कई द़ृश्यों को छोटा किया जा सकता था।
'द इंडिया स्टोरी' एक ऐसे विषय पर बनी फिल्म है जिस पर गंभीर चर्चा होना जरूरी है। यह दर्शकों को भोजन की गुणवत्ता, रासायनिक प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों पर सोचने के लिए प्रेरित करती है। हालांकि कमजोर पटकथा, साधारण निर्देशन और प्रभावहीन अदालती प्रस्तुति इसकी सबसे बड़ी बाधा बन जाते हैं।
यदि केवल विषय के आधार पर देखा जाए तो फिल्म सराहनीय प्रयास है, लेकिन मनोरंजन और सिनेमाई प्रभाव के स्तर पर यह अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाती। सीमित प्रचार-प्रसार और अपेक्षित सिनेमाई आकर्षण के अभाव में इसका बॉक्स ऑफिस पर मजबूत प्रदर्शन करना कठिन दिखाई देता है।
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