Phullu Completes 9 Years; Sharib Hashmi Says, It Was the First Hindi Film to Break the Taboo Surrounding Periods-m.khaskhabar.com
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'फुल्लू' को 9 साल पूरे, शारिब हाशमी बोले-'यह पहली हिंदी फिल्म, जिसने पीरियड्स से जुड़ी झिझक को तोड़ा'

khaskhabar.com: मंगलवार, 16 जून 2026 10:17 PM (IST)
'फुल्लू' को 9 साल पूरे, शारिब हाशमी बोले-'यह पहली हिंदी फिल्म, जिसने पीरियड्स से जुड़ी झिझक को तोड़ा'
मुंबई। अभिनेता शारिब हाशमी ने अपनी फिल्म 'फुल्लू' के 9 साल पूरे होने पर सोशल मीडिया पर एक खास पोस्ट साझा किया है। इस पोस्ट में उन्होंने फिल्म से जुड़ी कुछ अनदेखी तस्वीरें साझा की हैं, जिनमें फिल्म के अलग-अलग सीन्स और शूटिंग के पल दिखाई दे रहे हैं। इसके साथ उन्होंने फिल्म के सामाजिक संदेश को एक बार फिर से सामने रखा। शारिब हाशमी द्वारा इंस्टाग्राम पर पोस्ट की गई तस्वीरों में गांव की झलक और सेट पर बिताए कलाकारों संग खास पल नजर आ रहे हैं। इन तस्वीरों के साथ उन्होंने कैप्शन में लिखा, '''फुल्लू' को 9 साल पूरे हो गए हैं। यह पहली हिंदी फिल्म थी, जिसने पीरियड्स और उससे जुड़ी सामाजिक झिझक को तोड़ने की कोशिश की थी। ऐसी पहली पहल का हिस्सा बनना मेरे लिए गर्व की बात है और यह अनुभव करियर में हमेशा खास रहेगा।" फिल्म 'फुल्लू' के बारे में बात करें, तो इसका निर्देशन अभिषेक सक्सेना ने किया था। इस फिल्म में गांव की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर एक गंभीर सामाजिक मुद्दे को दिखाने की कोशिश की गई थी। फिल्म की मुख्य भूमिका में शारिब हाशमी के साथ अभिनेत्री ज्योति सेठी नजर आईं।
फिल्म की कहानी एक साधारण ग्रामीण व्यक्ति फुल्लू (शारिब हाशमी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी मासूमियत के लिए जाना जाता है। वह गांव में महिलाओं के बीच लोकप्रिय है, क्योंकि वह शहर जाकर उनके लिए जरूरी सामान लाने का काम करता है। गांव में उसके इस स्वभाव के कारण लोग उसका मजाक बनाते है लेकिन वह अपने तरीके से सबकी मदद करता रहता है। उसकी मां उसे अक्सर डांटती रहती है और चाहती है कि वह जिम्मेदार बने और काम करे लेकिन फुल्लू की जिंदगी उसी सरलता में चलती रहती है।
कहानी में बदलाव तब आता है जब फुल्लू को शहर में पीरियड्स से जुड़ी स्वच्छता के बारे में जानकारी मिलती है। उसे पता चलता है कि गांव की महिलाएं पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। इस जानकारी के बाद फुल्लू का जीवन बदल जाता है और वह तय करता है कि वह सैनिटरी पैड बनाने की प्रक्रिया सीखेगा और गांव की महिलाओं के लिए इसे उपलब्ध कराने की कोशिश करेगा। वह शहर जाकर फैक्ट्री में काम करता है और वहां से सीखकर गांव लौटता है।
गांव लौटने के बाद उसे कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लोग उसकी बातों पर विश्वास नहीं करते और कई बार उसका मजाक भी उड़ाया जाता है। हालांकि फुल्लू पीछे नहीं हटता और लगातार महिलाओं को जागरूक करने की कोशिश करता रहता है।
--आईएएनएस

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