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सावन का पहला मंगला गौरी व्रत 2026: जानें शुभ मुहूर्त, संपूर्ण पूजा विधि, मंत्र और पौराणिक कथा

ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:48 से 05:32 तक
प्रातः सन्ध्या: सुबह 05:10 से 06:16 तक
अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:19 से 01:10 तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 02:54 से 03:46 तक
गोधूलि मुहूर्त: शाम 07:13 से 07:35 तक
2. मंगला गौरी व्रत की संपूर्ण पूजा विधि
तैयारी व संकल्प: प्रातःकाल स्नान के बाद लाल, हरा, गुलाबी या पीला स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मंदिर के समक्ष हाथ में जल लेकर संकल्प लें:
"मैं संतान, सौभाग्य और सुख की प्राप्ति के लिए मंगला गौरी व्रत का अनुष्ठान कर रही/रहा हूं।"
आचमन एवं मार्जन: हथेली में जल लेकर तीन बार आचमन करें और हाथ या कुश से स्वयं पर पवित्र जल का छिड़काव (मार्जन) करें।
स्थापना: पूजा की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माता पार्वती/मंगला गौरी की प्रतिमा या चित्र रखें। साथ ही, अष्टगंध एवं चमेली की कलम से भोजपत्र पर लिखा मंगला गौरी यंत्र स्थापित करें।
दीपक व सामग्री (सोलह का महत्व): उत्तराभिमुख होकर बैठें। आटे का एक बड़ा दीपक बनाएं और उसमें 16 बत्तियां जलाएं। माता को 16 लड्डू, 16 फल, 16 पान, 16 लौंग, 16 इलायची, सुहाग की सामग्री और मिठाई अर्पित करें।
पूजन एवं मंत्र जाप: विधिवत पंचोपचार पूजन करें और निम्न में से किसी एक या सभी मंत्रों का जाप करें:
ॐ श्री मंगलायै नमः
ॐ उमामहेश्वराय नम:
ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।
(विशेष मनोकामना सिद्धि के लिए मंत्र: 'कुंकुमागुरुलिप्तांगा सर्वाभरणभूषिताम्। नीलकण्ठप्रियां गौरीं वन्देहं मंगलाह्वयाम्।।')
कथा व आरती: पूजन के पश्चात व्रत कथा सुनें और 16 बत्तियों वाले दीपक से माता की आरती करें।
दान: कथा व पूजन समाप्त होने पर 16 लड्डू अपनी सास को और अन्य सामग्री किसी योग्य ब्राह्मण को दान कर दें।
3. मंगला गौरी व्रत की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक गांव में एक धनी सेठ और उनकी पत्नी रहते थे। सब कुछ होते हुए भी निसंतान होने के कारण वे अत्यंत दुखी थे। एक दिन उनके घर पधारे एक साधु ने सेठ की पत्नी को सावन में मंगला गौरी व्रत रखने की सलाह दी। सेठ की पत्नी के नियमपूर्वक व्रत करने से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने भगवान शिव से उन्हें संतान का वरदान देने का आग्रह किया।
माता ने सेठ को स्वप्न में दर्शन देकर बताया कि एक आम के पेड़ के नीचे भगवान गणेश की प्रतिमा है, वहां से आम तोड़कर पत्नी को खिलाने पर पुत्र प्राप्त होगा। सेठ अगले दिन आम के पेड़ के पास पहुंचा और आम तोड़ने के लिए पत्थर फेंकने लगा। गलती से एक पत्थर गणेश जी की प्रतिमा को लग गया। क्रोधित होकर श्रीगणेश ने श्राप दिया, "तुझे पुत्र प्राप्त तो होगा, लेकिन वह केवल 21 वर्ष की अल्पायु तक ही जीवित रहेगा।" सेठ ने दुखी होकर आम पत्नी को खिला दिया, जिससे उन्हें एक सुंदर पुत्र मिला।
जब पुत्र 20 वर्ष का हुआ, तो सेठ उसके विवाह को लेकर चिंतित रहने लगा। एक दिन सेठ ने तालाब किनारे दो कन्याओं—कमला और मंगला—को बात करते सुना। कमला अपनी सहेली को सावन में मंगला गौरी व्रत करने की सलाह दे रही थी, जिससे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। सेठ ने सोचा कि यदि इस कन्या का विवाह मेरे पुत्र से हो जाए, तो माता के आशीर्वाद से मेरे पुत्र का जीवन बच जाएगा। सेठ ने कमला के पिता से बात कर अपने पुत्र का विवाह कमला से करवा दिया।
विवाह के बाद भी कमला नियमपूर्वक मंगला गौरी का व्रत रखती रही। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने स्वप्न में दर्शन देकर बताया, "तुम्हारा पति अल्पायु है और अगले माह मंगलवार को एक सर्प उसे डसने आएगा। तुम उसके लिए एक कटोरी में मीठा दूध और पास में खाली मटकी रख देना।"
मंगलवार आते ही कमला ने वैसा ही किया। सर्प आया, दूध पिया और मटकी में बैठ गया। कमला ने तुरंत मटकी का मुंह कपड़े से बांधकर उसे जंगल में छोड़ दिया। इस प्रकार मंगला गौरी व्रत के प्रभाव से कमला के पति को नया जीवन मिला और वह श्रापमुक्त हो गया।
4. व्रत का नियम व महत्व
अवधि: इस व्रत को विवाहिताएं प्रथम श्रावण में मायके में तथा बाकी चार वर्ष ससुराल में करती हैं। 5 वर्षों तक लगातार पूजन के बाद 5वें वर्ष के अंतिम मंगलवार को इसका उद्यापन किया जाता है।
फल: सावन मंगलवार के दिन माता मंगला गौरी की पूजा करने से पति पर आने वाले सभी संकट टल जाते हैं, वैवाहिक जीवन में मधुरता बनी रहती है तथा मांगलिक दोष का अशुभ प्रभाव समाप्त होता है।
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