Why did Rico leave valuable land worth Rs 3000 crore on Main Tonk Road?-m.khaskhabar.com
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Dec 1, 2023 5:57 am
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मैन टोंक रोड पर आखिर रीको ने क्यों छोड़ी 3000 करोड़ रुपए की बेशकीमती जमीन

khaskhabar.com : गुरुवार, 28 सितम्बर 2023 5:19 PM (IST)
मैन टोंक रोड पर आखिर रीको ने क्यों छोड़ी 3000 करोड़ रुपए की बेशकीमती जमीन
जयपुर। राजस्थान राज्य इंडस्ट्रियल डवलपमेंट एंड इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन (रीको) ने मैन टोंक रोड पर स्थित करीब 3000 करोड़ रुपए की बेशकीमती जमीन आखिर क्यों छोड़ी? वह भी तब जबकि खातेदारों को नकद मुआवजा दिया जा चुका था। रीको कोर्ट केसेज भी जीत चुका था। यहां तक सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की खंडपीठ के फैसले के आधार पर इसी अवाप्तशुदा जमीन के एक हिस्से में पास ही बसी तरूछाया नगर आवासीय कॉलोनी का रीको अफसर नियमन तक करवाने को तैयार नहीं है। वह भी उस स्थिति में जब वहां सैकड़ों परिवार दो दशक से भी ज्यादा समय से रह रहे हैं। यह सवाल भी कौन बनेगा करोड़पति (केबीसी) के जैसे ही करोडों रुपए का है। जबकि रीको के अधिकारी इस कदर एक्टिव हैं कि मुख्य टोंक रोड़ तक आने-जाने का रास्ता उपलब्ध नहीं होने के बावजूद अवाप्तशुदा जमीन पर उगे घने जंगल को उजाड़कर फिनटेक पार्क को मूर्त रूप देने में जुटे हैं।
पड़ताल में पता चला है कि मैन टोंक रोड की इस 36 एकड़ जमीन को छोड़ने में रीको विधि शाखा समेत कुछ अधिकारियों की सौदेबाजी हुई है। इसीलिए रीको अपनी इस जमीन को लेने का इच्छुक नहीं है ताकि बाद में इस जमीन में से फिनटेक पार्क तक आने-जाने की जमीन मांग कर प्रकरण को हमेशा के लिए सैटल किया जा सके। इससे जयपुर कॉलेज के नाम पर यह जमीन स्थाई रूप से व्यवसायी सुरेश गुप्ता के आवंटन को वैध करार दिया जा सके। सूत्र बताते हैं कि रीको विधि शाखा के अधिकारी अजय गुप्ता इस मामले में प्रारंभ से ही उच्चाधिकारियों को मिसगाइड करने में लगे हैं।
यह है इस जमीन की असली कहानी, पढ़िएः
दरअसल, रीको ने 1979 में औद्योगिक क्षेत्र के लिए 591 बीघा जमीन अवाप्त की थी। इसमें से 93 एकड़ यानि 148 बीघा पर ही मानसरोवर औद्योगिक क्षेत्र विकसित हो पाया था। जबकि ग्राम खोखा बास की, ढोल का बाढ़ और दुर्गापुरा क्षेत्र की 58 बीघा 13 बिस्वा भूमि जैम पार्क के विस्तार तथा औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाना प्रस्तावित था। इस जमीन का 18 अप्रैल, 1994 और 8 नवंबर, 1995 को अवार्ड घोषित किया गया। इसमें दो खातेदारों संगीता और हेमलता कमानी ने वर्ष 1998-99 में रीको से 44.63 लाख रुपए नकद मुआवजा ले लिया था।
फिर ऐसे हुआ कम्युनिटी कॉलेज की जमीन का खेलः
जब खातेदारों को लगा कि रीको से मुआवजा भी ले लिया तो इन्हीं में से एक खातेदार सुरेश गुप्ता जो कि केवल 1/7 भाग अर्थात 5 एकड़ जमीन का ही मालिक था, ने 7 मार्च, 2001 को रीको में इस भूमि को अवाप्ति से मुक्त करने की एप्लीकेशन लगाई। लेकिन, रीको और राज्य सरकार के स्तर पर तय हो गया कि यह जमीन अवाप्ति से मुक्त नहीं हो सकती थी।
इस पर जब सुरेश गुप्ता को लगा कि जमीन अवाप्ति से मुक्त नहीं होगी तो उसने फिर एक एप्लीकेशन लगाई। इसमें कहा गया कि इस अवाप्तशुदा भूमि में 36 एकड़ में से 18 एकड़ भूमि उसे जयपुर कम्युनिटी कॉलेज एवं रिसर्च सेंटर के लिए आवंटित कर दी जाए। इस पर 13 नवंबर, 2003 को रीको की आईडीसी में जयपुर कम्युनिटी कॉलेज को अवाप्ति अधिनियम की धज्जियां उड़ाते हुए कोर्ट के बाहर समझौता करते हुए 18 एकड़ भूमि आवंटित करने का फैसला कर लिया गया।
यह भी रोचक है कि मास्टर प्लान में पहले इस भूमि का उपयोग नर्सरी, आर्चरीड, पोल्ट्री एवं डेयरीज था। जिसे 22 जनवरी, 1997 को औद्योगिक कर दिया गया। रीको के सूत्र बताते हैं कि इस जमीन आवंटन में तत्कालीन अधिशासी निदेशक आर. के. शर्मा और विधि शाखा ने कुछ ज्यादा ही रुचि ली थी।
रीको कर चुका है आवंटन को रद्द :
इस प्रकरण में रीको की तत्कालीन प्रबंध निदेशक ने वर्ष 2016 में जिला कलेक्टर जयपुर को इस भूमि पर बने छोटे-मोटे स्ट्रक्चर को हटाकर 36 एकड़ का कब्जा रीको को दिलवाए जाने के लिए पत्र लिखा। अब देखिए कि सुरेश गुप्ता ने रीको की विधि शाखा के अधिकारियों से मिलीभगत कर कोर्ट को गुमराह कर स्टे ले लिया।
रीको के तेज तर्रार अजय गुप्ता अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी चुपी साधे बैठें है क्योंकि 3000 करोड़ की इस जमीन को सुरेश गुप्ता के लिए जो बचाना है। रीको लीगल शाखा के इस भेदभाव वाली नीति और 3000 करोड़ की जमीन को खुर्द-बुर्द करने के लिए मिलीभगत की शिकायत एंटी करप्शन ब्यूरो को करने की तैयारी आसपास के कॉलोनीवासियों ने कर ली है।

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