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अयोध्या राम मंदिर में वीआईपी पास की व्यवस्था समाप्त, संतों ने फैसले का किया स्वागत

दिवाकर आचार्य ने भी इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह एक सराहनीय और ऐतिहासिक निर्णय है। हालांकि, उन्होंने इस अवसर पर यह सवाल भी उठाया कि आखिर मंदिरों में वीआईपी संस्कृति की शुरुआत किसने की। भगवान श्रीराम के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले लोगों को कभी किसी पहचान पत्र, जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति के आधार पर विशेष सुविधा नहीं मिली थी। लंबे समय से ऐसी स्थिति देखने को मिल रही थी कि कुछ लोगों को वीआईपी व्यवस्था के माध्यम से सीधे भगवान श्रीरामलला के दर्शन कराए जाते थे, जबकि सच्ची श्रद्धा रखने वाले सामान्य भक्तों को घंटों लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ता था। भगवान के दरबार में सभी श्रद्धालु समान हैं और किसी प्रकार का विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए।
दिवाकर आचार्य ने आगे कहा कि वीआईपी पास व्यवस्था समाप्त करने का निर्णय न केवल प्रशंसनीय है, बल्कि यह भगवान श्रीराम के आदर्शों और समानता के संदेश के अनुरूप भी है। उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को इस फैसले के लिए बधाई और शुभकामनाएं देते हुए उम्मीद जताई कि भविष्य में भी श्रद्धालुओं की सुविधा और समानता को प्राथमिकता दी जाएगी।
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