UPSC : संघर्ष की कहानी या लोकप्रियता का कथानक ?

यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या यह केवल प्रेरणा देने का प्रयास है या फिर लोकप्रियता हासिल करने की एक रणनीति? इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है, क्योंकि इसके पीछे कई सामाजिक, सांस्कृतिक और माध्यम-संबंधी कारण छिपे हुए हैं। भारतीय समाज में संघर्ष की कहानियाँ हमेशा से अत्यधिक सम्मानित रही हैं। जब कोई व्यक्ति कठिन परिस्थितियों से निकलकर बड़ी सफलता हासिल करता है, तो वह कहानी लाखों लोगों को प्रेरित करती है। यही कारण है कि समाचार माध्यम अक्सर ऐसे उदाहरणों को प्रमुखता से प्रस्तुत करते हैं, जहाँ कोई अभ्यर्थी सीमित संसाधनों, आर्थिक कठिनाइयों या ग्रामीण पृष्ठभूमि के बावजूद सफलता प्राप्त करता है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसी कहानियाँ समाज के लिए सकारात्मक भूमिका निभाती हैं। वे युवाओं को यह विश्वास दिलाती हैं कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, मेहनत और दृढ़ संकल्प से सफलता हासिल की जा सकती है। भारत जैसे देश में, जहाँ आज भी ग्रामीण और शहरी अवसरों के बीच बड़ा अंतर मौजूद है, ऐसी कहानियाँ उम्मीद और प्रेरणा का स्रोत बनती हैं। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब वास्तविकता से अधिक आकर्षक या भावनात्मक कहानी प्रस्तुत करने का दबाव बढ़ जाता है। सामाजिक माध्यमों के इस दौर में हर व्यक्ति अपनी कहानी को इस तरह प्रस्तुत करना चाहता है कि वह अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे और उन्हें प्रभावित करे। इस प्रक्रिया में कभी-कभी वास्तविक पृष्ठभूमि की जटिलता को सरल और भावनात्मक कथा में बदल दिया जाता है।
आज के समय में समाचार माध्यम और सामाजिक माध्यम किसी भी व्यक्ति की छवि बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक सफल अभ्यर्थी की कहानी कुछ ही घंटों में पूरे देश में फैल सकती है। विभिन्न साक्षात्कार, वीडियो मंच और समाचार लेख अक्सर उस कहानी के ऐसे पहलुओं को सामने लाते हैं जो भावनात्मक और प्रेरणादायक हों। माध्यमों की दृष्टि से यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि दर्शक और पाठक ऐसी कहानियों से अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं। “गाँव से निकलकर प्रशासनिक सेवा में पहुँचा युवक” या “किसान की बेटी जिसने प्रशासनिक सेवा में स्थान बनाया” जैसी सुर्खियाँ तुरंत ध्यान आकर्षित करती हैं। परिणामस्वरूप, कभी-कभी कहानी के कुछ हिस्सों को अधिक महत्व दिया जाता है, जबकि अन्य पहलू पीछे छूट जाते हैं।
यदि किसी अभ्यर्थी का परिवार मूल रूप से ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ा रहा हो, लेकिन उसकी शिक्षा और परवरिश शहरों में हुई हो, तो माध्यम अक्सर उसी ग्रामीण संबंध को प्रमुखता से प्रस्तुत करते हैं। इससे वास्तविकता का एक आंशिक चित्र सामने आता है। भारत जैसे विशाल और विविध समाज में पहचान हमेशा सरल और एक-आयामी नहीं होती। किसी व्यक्ति का जन्म गाँव में हो सकता है, लेकिन शिक्षा शहर में हुई हो सकती है। किसी के माता-पिता खेती से जुड़े हो सकते हैं, जबकि परिवार की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत हो सकती है। वास्तव में दोनों बातें एक साथ सही हो सकती हैं। लेकिन जब कहानी को सरल और प्रभावी बनाने की कोशिश की जाती है, तो अक्सर एक ही पहचान को प्रमुखता दी जाती है। यही कारण है कि कभी-कभी लोगों को यह लगता है कि वास्तविकता से अलग या बढ़ा-चढ़ाकर चित्र प्रस्तुत किया जा रहा है।
आज का समय छवि और कथानक का समय है। सामाजिक माध्यमों ने हर व्यक्ति को अपनी छवि गढ़ने का अवसर दिया है। लोग केवल यह नहीं बताते कि वे कौन हैं, बल्कि यह भी तय करते हैं कि वे समाज के सामने कैसे दिखाई देना चाहते हैं। लेकिन जब यह प्रक्रिया वास्तविकता से अधिक छवि-निर्माण पर आधारित होने लगती है, तो यह आलोचना का विषय बन जाती है। समाज को यह महसूस होने लगता है कि लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए पहचान का उपयोग किया जा रहा है। यह भी याद रखना आवश्यक है कि हर सफल अभ्यर्थी ऐसा नहीं करता। देश में हजारों ऐसे अधिकारी हैं जो अपनी पृष्ठभूमि के बारे में ईमानदारी से बात करते हैं और अपनी सफलता को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं।
अंततः प्रशासनिक सेवा में सफलता का वास्तविक मूल्य इस बात से तय होना चाहिए कि कोई अधिकारी अपने पद का उपयोग समाज के हित में किस प्रकार करता है। ईमानदारी, संवेदनशीलता और जनसेवा की भावना ही किसी भी अधिकारी की सबसे बड़ी पहचान होती है। लोकप्रियता क्षणिक हो सकती है, लेकिन सच्ची सेवा और ईमानदार कार्य ही वह आधार है जो किसी व्यक्ति को स्थायी सम्मान दिलाता है।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
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