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अनकही को समझने का समय

भाजपा के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए बांकेपुर और दतिया विधानसभा सीट पर भाजपा की हार ऐसा ही अवसर है। यहाँ के मतदाताओं ने जानबूझकर भाजपा को हराने के लिए मतदान किया। यह तब और चिंताजनक हो जाती है जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का वोट जिस बूथ पर पड़ता है वह बूथ भी भाजपा हार गई और विधानसभा चुनाव भी। यही हाल दतिया में रहा। यह इस बात का द्योतक है कि मतदाताओं ने भाजपा नेतृत्व के निर्णयों से असहमति व्यक्त की है। यही वो संकेत है जिसे भाजपा नेतृत्व को चुनौती के रूप में समझना पड़ेगा।
राजनीति के जानकार यह मानते हैं कि जिस तरह की पराजय का सामना बांकेपुर और दतिया में हुआ है, यही स्थिति राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और दिल्ली में भी देखने को भी मिल सकती है। उसकी वजह कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की भाजपा से उकताहट नहीं है अपितु राज्यों में दिए गए नए नेतृत्व का कार्यकर्ताओं और मतदाताओं से अपेक्षित जुड़ाव और समर्थन नहीं होना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2047 में विकसित भारत के लिए उभारे जा रहे नए नेतृत्व को राज्यों में भाजपा के नेता, सांसद, विधायक और कार्यकर्ता ही स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन मोदी - शाह के नेतृत्व में मिल रही जीत के चमत्कार के कारण चुप हैं। तो क्या यह माना जाना चाहिए कि भाजपा द्वारा नवीन नेतृत्व निर्माण के प्रयोग को लागू करने को लेकर मतदाताओं, समर्थकों और कार्यकर्ताओं में व्यापक असहमति है। लेकिन वो अपनी कई शिकायतों के बावजूद मौन हैं।
यही वो विचार बिंदु है जिस पर भाजपा नेतृत्व और उसके वैचारिक सहयोगी संगठनों को अपनी नीति कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच स्पष्ट करनी होगी। इन नतीजों का सार सिर्फ इतना है कि भाजपा नेतृत्व को भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की अनकही को सुनना पड़ेगा। राजनीति की उठा पटक अपनी जगह लेकिन मूल मतदाताओं और मुद्दों से भाजपा का भटकाव कार्यकर्ताओं और समर्थकों को स्वीकार नहीं है।
नोटः लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट, जयपुर के निदेशक हैं।
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