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संघ और स्वयंसेवकों की अग्नि परीक्षा का समय

khaskhabar.com: सोमवार, 10 अगस्त 2026 1:10 PM (IST)
संघ और स्वयंसेवकों की अग्नि परीक्षा का समय
- सुरेंद्र चतुर्वेदी - राजनीतिक दृष्टि से अब तक हाशिए पर रही तरुणाई अब केंद्र में है। हालांकि इतिहास तरुणाई के कारनामों और बलिदानों से भरा पड़ा है लेकिन स्वतंत्र भारत में ऐसा पहली बार होता दिख रहा है कि तरुणाई के आचरण, व्यवहार और आवश्यकताओं को लेकर राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन सचेष्ट हुए हैं और अब उनके चिंतन के केंद्र में देश की तरुणाई है।
इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन राव भागवत का जेन -जी से संवाद व्यापक चर्चा में है। जो लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को नहीं जानते उनके लिए यह बात अनूठी और विस्मयकारक हो सकती है लेकिन संघ के सामान्य स्वयंसेवकों के लिए यह संवाद संघ की कार्य पद्धति का ही छोटा सा अंश है। अपनी स्थापना के सौ वर्षों में संघ कार्य का विस्तार जेनरेशन नेक्स यानि तरुणाई के आस पास ही हुआ है।
संघ संस्कारों का बीजारोपण तो सायं शाखाओं में ही हो जाता है। जहाँ बच्चे खेल खेल में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और माँ भारती के पुत्र के रूप में दीक्षित हो जाते हैं। सौ वर्षों के इस अनथक प्रयास का ही परिणाम है कि देश का प्रधानमंत्री और उनके मंत्री मंडल के कई सहयोगी स्वयंसेवक है। तो मूल विषय यह है कि भारत का मन किस तरह की तरुणाई को स्वीकार करता है ?
पहली जो जंतर मंतर पर अराजक माहौल में उत्पात मचाते हुए अभद्र भाषा से युक्त उपद्रव करती है या दूसरी जो झारखंड की राजधानी रांची में विनम्र किंतु दृढ़ निश्चय के साथ अपना अधिकार पाने और व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए आंदोलनरत है। यह सही है कि सोशल मीडिया के इस दौर ने तरुणाई को अभिव्यक्ति के नए आयाम दिए हैं, लेकिन विश्व के सबसे युवा संसाधनों के धनी भारत में तरुणाई की बैचेनी और बेबसी के निदान के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों की भूमिका सरकार से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ख़ुद आंदोलित तरुणाई के दौर से निकल कर उस स्थान तक पहुँचे हैं जहाँ सत्ता और समाज का समन्वय बिंदु बनता है। एक दृष्टि से देखें तो जब संघ विचार का विस्तार करने वाली पार्टी सत्ता में हो तो समाज और शासन में समन्वय स्थापित करने की जिम्मेदारी भी स्वतः ही उन पर आ जाती है। गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि एक बार फिर महाभारत की चौसर बिछ चुकी है जिसमें दुर्योधन है, शकुनि है, शिखंडी है, दुःशासन और कर्ण हैं। एक विक्षिप्त महारानी है।
भीष्म, कालनेमी, द्रोणाचार्य और अनेकों कौरव (भ्रमित तरुणाई ) हैं, जिन्हें किसी भी हाल में सत्ता चाहिए चाहे इसके लिए देश को गृहयुद्ध में ही क्यों ना धकेलना पड़े। तो एक दृष्टि से देखा जाये तो ये अग्नि परीक्षा सरकार के साथ साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी है। देखना यह है कि स्वयंसेवक कहाँ खड़े हैं ?
नोटः लेखक, सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट जयपुर के निदेशक हैं।

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