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राजस्थान में सियासत के तीन राजकुमारों की कहानी...चुनावी बिसात पर चौंकाने वाली चाल

khaskhabar.com : बुधवार, 05 जून 2024 4:39 PM (IST)
राजस्थान में सियासत के तीन राजकुमारों की कहानी...चुनावी बिसात पर चौंकाने वाली चाल
बांसवाड़ा। राजस्थान की राजनीति में इस बार एक अनोखी और दिलचस्प कहानी ने जन्म लिया है। लोकसभा चुनाव 2024 में डूंगरपुर-बांसवाड़ा सीट पर तीन राजकुमारों ने चुनावी बिसात पर अपने-अपने मोहरे चलाए। आखिर में एक राजकुमार ने जीत का ताज पहना, लेकिन बाकी दो की चालों ने भी सियासी गलियारों में खलबली मचा दी। इनकी स्थिति वैसी ही रही जैसे क्रिकेट में शतक लगाने वाले खिलाड़ी, जो भले ही मैच हार जाएं, पर दिल जरूर जीत लेते हैं।


चुनाव से पहले, बीजेपी ने बड़ा सियासी दांव खेलते हुए कांग्रेस के दिग्गज आदिवासी नेता महेंद्रजीत मालवीया को पार्टी में शामिल कर उन्हें टिकट थमाया। मालवीया राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं, जो शतरंज की बिसात पर हर चाल को बखूबी समझते और चलते हैं। लेकिन इस बार उनकी रणनीति को तीन राजकुमारों ने चुनौती दी।

पहला राजकुमार: भारतीय आदिवासी पार्टी (बाप) के प्रत्याशी राजकुमार रोत। चुनाव में उन्होंने मालवीया को बड़े अंतर से हराकर अपनी जीत सुनिश्चित की।

दूसरा और तीसरा राजकुमार: मालवीया ने अपनी जीत पक्की करने के लिए खुद के उम्मीदवार उतारे। इनमें से एक थे हीरालाल और दूसरे प्रेमजी। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब हीरालाल को 74,598 और प्रेमजी को 41,790 वोट मिले। फिर भी, राजकुमार रोत ने मालवीया को 2,47,054 वोटों से हराया।

चुनावी माहौल को और जटिल बनाते हुए, कांग्रेस ने अरविंद सीता डामोर को उम्मीदवार घोषित कर दिया था। गठबंधन की प्रक्रिया के दौरान, जब अरविंद को नामांकन वापस लेने को कहा गया, तो वे गायब हो गए। इसके पीछे भी मालवीया का हाथ होने की अटकलें लगाई गईं। लेकिन, अरविंद ने नामांकन वापस नहीं लिया, जिससे कांग्रेस को अंततः बाप प्रत्याशी का समर्थन करना पड़ा। फिर भी, कांग्रेस प्रत्याशी अरविंद को 61,211 वोट मिले।

इस चुनावी मैदान में अन्य खिलाड़ी भी थे। बहुजन समाज पार्टी के दिलीप मीणा को 8,591 वोट, इंडियन पिपुल्स ग्रीन पार्टी के शंकरलाल बामनिया को 17,188 वोट, निर्दलीय बंसीलाल अहारी को 17,896 वोट और नोटा को 20,970 वोट मिले।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मालवीया और बीजेपी की यह हार एक बड़ी रणनीतिक विफलता है। इसके साथ ही, मालवीया के राजनीतिक करियर पर भी एक बड़ा विराम लग गया है। इस चुनाव ने साबित कर दिया कि राजनीति में हर चाल मायने रखती है और कभी-कभी जीत का सेहरा किसी और के सिर बंध जाता है, चाहे मोहरे कितने भी मजबूत क्यों न हों।

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