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देश के इन वीरों ने दो बार पठानों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। मगर जब दीवारें टूटने लगीं तो हवलदार ईशर सिंह ने अपने साथियों को भीतर जाने का आदेश दिया और स्वयं मोर्चे पर डटे रहे। एक-एक करके सभी जवान शहीद होते गए लेकिन उन्होंने दुश्मनों को भारी क्षति पहुंचाई।
सबसे पहले सिपाही भगवान सिंह शहीद हुए। नायक लाल सिंह गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी लड़ते रहे। अंत में बचे थे सिपाही गुरमुख सिंह, जिन्होंने लड़ते-लड़ते लगभग 40 दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया। जब उन्हें रोकना असंभव हो गया तो दुश्मनों ने चौकी को आग लगा दी। जलती हुई चौकी से उनकी आखिरी पुकार गूंजी, 'बोले सो निहाल, सत श्री अकाल!'
स्थिति ऐसी हो गई कि पठानों ने चौकी तो ढहा दी, लेकिन उनकी इतनी ताकत और समय बर्बाद हुआ कि वे गुलिस्तान किले पर कब्ज़ा नहीं कर पाए। रात में वहां मदद पहुंच गई और किला बचा लिया गया। इतिहासकारों के अनुसार इस युद्ध में 600 से अधिक पठान मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। राहत दल जब पहुंचा तो चौकी के आसपास लगभग 1400 शव बिखरे पड़े थे।
भारत सरकार ने इन बलिदान की स्मृति में स्मारक बनवाया और उन्हें इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट (उस दौर का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार, जो आज के परमवीर चक्र के समकक्ष है) से मरणोपरांत सम्मानित किया।
--आईएएनएस
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