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समाज की धड़कनों में धड़कते रहने वाला नाम...जी.डी. मित्तल नहीं रहे

जीवन का सच यही है कि अंत अनिवार्य है, परंतु कुछ लोग अपनी यात्रा में ऐसे निशान छोड़ जाते हैं, जिन पर चलते हुए आने वाली पीढ़ियां रास्ता पहचानती हैं। मित्तल जी की सेवा-यात्रा भी ऐसी ही रही। उनका घर हमेशा मिलने वालों से भरा रहता था, जैसे समाज ने उन्हें अपना ‘सामूहिक संरक्षक’ बना रखा हो।
उनके जाने के बाद रह गई है—धर्मपत्नी की आंखों में स्मृतियों की नमी, पुत्र गुंजन अग्रवाल और मयंक अग्रवाल के कंधों पर ज़िम्मेदारियों का भार, और शहर के हर दिल में वह खालीपन, जिसे भर पाना कठिन होगा।
13 सितम्बर को अग्रेसन भवन में जब उनकी स्मृति में उठावना होगा, तब सिर्फ परिजन ही नहीं, पूरा जोधपुर उन्हें श्रद्धांजलि देगा। क्योंकि समाज को देने वाला हाथ हमेशा याद रखा जाता है।
उनके साथ गुजरी मुलाकातें अब स्मृतियों में बदल चुकी हैं। शहर की भीड़ में उनकी हंसी, उनकी सहजता और उनकी प्रतिबद्धता अब दिखाई नहीं देगी। लेकिन यह सच है कि समाज में उनके जैसे लोग विरले ही मिलते हैं—जो पद के लिए नहीं, बल्कि समाज की धड़कन के लिए जीते हैं।
जी.डी. मित्तल चले गए हैं, पर उनका काम, उनकी सेवा और उनका दिया हुआ मानवीय स्पर्श हमेशा जीवित रहेगा।
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