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जुमलों से नहीं, अब जवाबदेही से चलेगा देश: ‘काकरोच’ ही नहीं जेन-अल्फा भी माँगने लगे हैं अपने हक़

khaskhabar.com: शनिवार, 15 अगस्त 2026 10:17 PM (IST)
जुमलों से नहीं, अब जवाबदेही से चलेगा देश: ‘काकरोच’ ही नहीं जेन-अल्फा भी माँगने लगे हैं अपने हक़
ज का भारत बदल रहा है। यह बदलाव केवल राजनीति की बहसों में नहीं, बल्कि ज़मीन पर दिखाई दे रहा है। हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए 'काकरोच जनता पार्टी' के सांकेतिक आंदोलन के बाद जैसे पूरे देश की Gen Z और Gen Alpha नींद से जाग उठी है। झारखंड से लेकर राजस्थान तक और मध्य प्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश तक अचानक स्कूली बच्चों और युवाओं के ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जो सीधे शासन-प्रशासन की आँखों में आँखें डालकर सवाल पूछ रहे हैं। यह कोई राजनीति से प्रेरित आंदोलन नहीं है। बल्कि यह गुस्सा उस जर्जर सिस्टम के खिलाफ है, जो दशकों से बुनियादी सुविधाओं के नाम पर जनता को गुमराह करता आ रहा है। जर्जर स्कूल, टूटी सड़कें: बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्षः
देश के अलग-अलग हिस्सों की तस्वीरें एक ही कहानी बयां कर रही हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के गृह क्षेत्र उज्जैन में छात्राओं को अपनी वाजिब ज़रूरतों के लिए आवाज़ उठानी पड़ रही है। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में स्कूल जाने के लिए एक अदद अच्छी सड़क की माँग को लेकर स्कूली बच्चे डीएम ऑफिस का घेराव करने पर मजबूर हुए। राजस्थान में अलवर जिले के थानागाजी में छात्राओं ने प्रशासन को दो टूक शब्दों में अपनी समस्याएँ सुना दीं और अपनी माँगें मनवाईं।
आखिर इन बच्चों की माँगें क्या हैं?
क्या ये कोई चाँद-तारे माँग रहे हैं? नहीं। इनकी माँगें बहुत साधारण और बुनियादी हैं, जैैसे सुरक्षित स्कूल भवन जहाँ छत टपकती न हो और दीवारें गिरने का डर न हो। जहाँ कक्षाओं में पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक हों। स्कूल आने-जाने के लिए सुरक्षित और पक्की सड़कें हों।
युवा और जेन-जी का दर्द: निष्पक्ष परीक्षा और रोज़गारः
स्कूल की दहलीज पार करते ही युवाओं (जेन-जी) का सामना एक और विकराल समस्या से होता है। सालों की मेहनत के बाद जब युवा किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते हैं, तो पता चलता है कि ‘पेपर लीक’ हो गया है। इससे कई छात्र डिप्रेशन में आ जाते हैं। आर्थिक समस्याओं, पारिवारिक दबाव औऱ शासन-प्रशासन की नाकामी केे कारण वे आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर हो जाते हैं। यह स्थिति किसी भी एंगल से अच्छी नहीं कही जा सकती।
आज के युवा की माँग बहुत स्पष्ट है:
सुरक्षित व पारदर्शी परीक्षा सिस्टम: पेपर लीक जैसी घटनाओं पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई हो और पारदर्शी व्यवस्था बने। पेपर लीक करने वालों की सारी संपत्ति कुर्क करने के साथ ही हर तरह की सरकारी सुविधाओं से वंचित करने जैसे कड़े कदम उठाए जाने चाहिए।
समान रोज़गार के अवसर: डिग्रियों के अंबार के बीच हर योग्य युवा को सम्मानजनक रोज़गार मिले। आज़ादी के 80 साल होने को आए हैं। अगर आज भी देश की सरकारें शिक्षा, सड़क और रोज़गार जैसी मूलभूत समस्याओं का हल नहीं निकाल पाई हैं, तो युवाओं का यह आक्रोश पूरी तरह स्वाभाविक और जायज़ है।
राजनीतिक मुफ़्तखोरी और असल मुद्दों से दूरीः
दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था और प्रशासनिक मशीनरी जन-आकांक्षाओं से कटी हुई लगती है। जन-प्रतिनिधियों की प्राथमिकताएँ जनता की ज़रूरतों से मेल नहीं खातीं। सत्ता पाने के लिए राजनीतिक दल मुफ़्त राशन, किसान सम्मान निधि, पेंशन और तरह-तरह की रेवड़ियों (मुफ़्त सुविधाओं) का चुग्गा फेंकते हैं। मुफ़्त योजनाओं के शोर में सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और यहाँ तक कि शहरों में रोज़ बढ़ती 'पार्किंग' और ट्रैफिक जैसी विकराल समस्याओं पर ध्यान ही नहीं दिया जाता। राजनीतिक नेतृत्व को यह समझना होगा कि अब जनता केवल खोखले दावों, चुनावी जुमलों और लोकलुभावन घोषणाओं से बहलने वाली नहीं है। अगर समय रहते बुनियादी ढाँचे को ठीक नहीं किया गया, तो यह जन-आक्रोश और भी विकराल रूप ले सकता है।
न्याय व्यवस्था को भी आत्ममंथन की जरूरतः
इस पूरे घटनाक्रम में देश की न्यायिक व्यवस्था को भी गंभीरता से आत्ममंथन करने की ज़रूरत है। जंतर-मंतर पर 'काकरोच जनता पार्टी' के नाम से जो जन-उभार दिखा, उसकी नींव कहीं न कहीं न्यायपालिका की एक टिप्पणी (जहाँ आम युवाओं की स्थिति को 'काकरोच' के समान उपेक्षित बताया गया) से जुड़ी है। आम जनता के लिए आज न्याय पाना एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है। सामान्य नागरिक के लिए अदालतों का चक्कर लगाना आर्थिक रूप से असंभव होता जा रहा है।
अदालतों में मुकदमों के ढेर लगे हैं और न्याय मिलने में दशकों बीत जाते हैं। कानून का यह पुराना नियम है कि "न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए।" इस दिशा में एक व्यावहारिक समाधान यह हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट और बार काउंसिल मिलकर वकीलों की फीस की अधिकतम सीमा और मुकदमों के निस्तारण की भी अधिकतम समय सीमा तय करें, ताकि न्याय आम से आम नागरिक की पहुँच में आ सके।
दरअसल, जेन-जी और जेन अल्फा का यह आक्रोश एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। यह इस बात का प्रमाण है कि देश का भविष्य अब अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हो चुका है। वे अब राजनीति की पुरानी चालों में फँसने वाले नहीं हैं। यदि शासन, प्रशासन और न्यायपालिका ने इस ज़मीनी हकीकत को अब भी नज़रअंदाज़ किया, तो यह गुस्सा आने वाले समय में नीति-निर्माताओं के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन जाएगा। देश को अब भाषण नहीं, बुनियादी ढाँचे का ठोस सुधार और जवाबदेह शासन चाहिए।
(नोटः- ये लेखक के अपने निजी विचार हैं। )

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