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शिक्षा और सुरक्षा के बीच फँसी छात्राएँ: यौन शोषण के अड्डे बनते स्कूल-कॉलेज

यौन उत्पीड़न से जुड़े नियम, आंतरिक शिकायत समितियाँ (आईसीसी), विशाखा दिशानिर्देश और पोश अधिनियम—सब कुछ कागजों में है। लेकिन वास्तविकता यह है कि कई संस्थानों में ये समितियाँ या तो नाममात्र की हैं या फिर प्रबंधन के प्रभाव में काम करती हैं। शिकायतकर्ता को न्याय दिलाने के बजाय मामले को “संस्था की छवि” के नाम पर दबाने की कोशिश की जाती है। यही कारण है कि न्याय की प्रक्रिया पीड़िता के लिए एक और मानसिक उत्पीड़न बन जाती है।
शिक्षण संस्थानों में सत्ता का असंतुलन भी इस समस्या की जड़ में है। शिक्षक, प्रबंधन और प्रशासन के पास मूल्यांकन, नियुक्ति, प्रमोशन और भविष्य तय करने की शक्ति होती है। इस शक्ति का दुरुपयोग जब व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए किया जाता है, तो छात्रा या जूनियर स्टाफ खुद को असहाय महसूस करता है। यही असहायता अपराध को जन्म देती है और अपराधी को संरक्षण। एक और गंभीर मुद्दा है—संवेदनशीलता की कमी। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम और डिग्री तक सीमित हो गई है। नैतिकता, लैंगिक सम्मान और मानवीय मूल्यों की बात भाषणों तक सिमट गई है। जब शिक्षक ही मर्यादा लांघते दिखाई दें, तो छात्रों को समाज से क्या संदेश जाता है? ऐसे में “शिक्षा का मंदिर” कहना एक विडंबना बनकर रह जाता है।
राज्य सरकारों और शिक्षा विभागों की जिम्मेदारी यहीं खत्म नहीं होती कि वे आदेश जारी कर दें या हेल्पलाइन नंबर छपवा दें। ज़रूरत है प्रभावी निगरानी की, नियमित ऑडिट की और स्वतंत्र शिकायत तंत्र की। शिकायत समिति में बाहरी, निष्पक्ष और महिला प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए। शिकायत की गोपनीयता और पीड़िता की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो—यह केवल नियम नहीं, व्यवहार में दिखना चाहिए। समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जब तक हम पीड़िता से सवाल पूछते रहेंगे—“वहाँ क्यों गई?”, “पहले क्यों नहीं बताया?”—तब तक अपराधी बेखौफ रहेगा। दोषी कौन है, यह तय करने की जिम्मेदारी कानून की है, लेकिन सहानुभूति और समर्थन समाज को देना होगा।
चुप्पी तटस्थता नहीं, बल्कि अपराध के पक्ष में खड़ा होना है। आज आवश्यकता है भरोसे की—ऐसे भरोसे की, जिसमें छात्रा निडर होकर शिकायत कर सके; शिक्षक अपने आचरण के प्रति जवाबदेह हों; और संस्थान अपनी छवि से ज्यादा अपने छात्रों की सुरक्षा को महत्व दें। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि सुरक्षित और संवेदनशील नागरिक तैयार करना भी है। यदि सच में हमें शिक्षा को मंदिर बनाए रखना है, तो पहले उसे डर, शोषण और मौन की संस्कृति से मुक्त करना होगा। कानून मजबूत है, पर उससे ज्यादा मजबूत होना चाहिए संस्थानों का नैतिक साहस। क्योंकि जब शिक्षा असुरक्षित हो जाती है, तो केवल वर्तमान नहीं, पूरा भविष्य खतरे में पड़ जाता है।
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