Silicosis patients are troubled by middlemen and brokers in Bhajanlal government,-m.khaskhabar.com
×
khaskhabar
May 23, 2024 4:01 pm
Location
Advertisement

भजनलाल सरकार में बिचौलियोंं, दलालों से परेशान हैं सिलिकोसिस के मरीज, आखिर कैसे, यहां पढ़ें

khaskhabar.com : बुधवार, 15 मई 2024 5:34 PM (IST)
भजनलाल सरकार में बिचौलियोंं, दलालों से परेशान हैं सिलिकोसिस के मरीज, आखिर कैसे, यहां पढ़ें


जयपुर । राजस्थान की खदानो में काम करने वाले सिलिकोसिस बीमारी से पीडित श्रमिकों के लिए सिस्टम की कमियां इस रोग को और जानलेवा बना रही हैं। ये मरीज अपनी बीमारी से तो परेशान हैं ही, लेकिन उनके कार्यस्थलों पर नियमानुसार सुविधाएं ना होना, समय पर उपचार ना मिल पाना, सरकारी सहायता प्राप्त करने में होने वाली परेशनी और बिचौलियों व दलालो के चक्रव्यूह ने उनकी परेशानियों को कई गुना बढा दिया है। यह स्थिति खुद सरकार की ओर से कराई गई एक मूल्यांकन जांच में सामने आई है।

आपको बता दे कि दौसा जिले में बीते दिनों ही सिलिकोसिस बीमारी के नाम पर 4 करोड़ से अधिक धनराशि के गबन के मामले कई डॉक्टरों और नर्सिंग स्टॉफ पर गाज गिर चुकी है ।


राजस्थान में खनन बहुत बडा व्यवसाय है और प्रदेश भर में करीब 33 हजार खदानें चल रही हैं। इन खदानों में हजारेां की संख्या में श्रमिक काम कर रहे हैं। खदानों में काम करने के कारण ये मरीज लगातार धूल के कणे में सम्पर्क मे आते है और सिलिकोसिस जैसे रोग की चपेट में आ जाते हैं जो पहले उनकी कार्यक्षमता पर ग्रहण लगाता और अंतत: जीवन समाप्त कर देता है।
इस रोग से पीडित लोगों की सहायता के लिए सरकार के सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग की ओर से 2019 में सिलिकोसिस नीति लागू की गई थी, जिसके तहत कई तरह की आर्थिक सहायता इस रेाग से पीडित मरीज और उसके परिवार को दी जाती है। यह नीति सरकार के सामाजिक न्याय व अधिकािरता विभाग की ओर से संचालित की जाती है। इसके तहत प्रदेश भर में 35 हजार से ज्यादा सिलिकोसिस पीडित मरीजों और उनके परिवारों को सहायता दी जा रही है।
सरकार के मूल्यांकन विभाग की ओर से पिछले दिनों इस नीति के तहत दी जा रही सहायता का मूल्यांकन अध्ययन किया गया और प्रदेश भर में चल रही खदानों तथा ऐसे स्थान जहां इस रोग के होने की सम्भावना अधिक है, वहां फील्ड सर्वे व अध्ययन किए गए। इस अध्ययन में कई तरह कमियां और गडबडियां सामने आई हैं और यह उजागर हुआ है कि सरकार तो अपनी ओर से सहायता दे रही है, लेकिन एक तरफ श्रमिकों में इस योजना की जानकारी का अभाव है, वहीं दूसरी ओर जानकारी होने पर भी होने विभिन्न कारणों से योजना का लाभ नहीं मिल पाता है। इसके साथ ही मॉनिटरिंग नहीं होने के कारण खदानों और अन्य कार्यस्थलों पर जो सुविधाएं होनी चाहिए, वे भी उपलब्ध नहीं हैं।


श्रमिकों को मिलते हैं यह लाभ

- रोग से पीडित पाए जाने पर तीन लाख और मृत्यु के बाद परिजनों को दो लाख रूपए की आर्थिक सहायता।

- सिलिकोसिस रोगी की मृत्यु होने पर अन्तिम संस्कार के लिए दस हजार रूपए की सहायता।

- पीडित को प्रतिमाह 1500/ऽ- प्रति माह पेंशन

- सिलिकोसिस पीडित परिवार के बच्चों को 6 वर्ष की आयु तक 500 प्रतिमाह, 6 वर्ष से 18 वर्ष की आयु तक राशि रु 1000 प्रतिमाह एवं प्रत्येक बच्चे को 2000 रूपए की वार्षिक एकमुश्त सहायता दी जाती है।

-- इसके अलावा इनके परिवार को बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सभी सुविधाएं और खाद्य सुरक्षा योजना के लाभ दिए जाते हैं।

यह कमियां आई सामने
- अधिकांश श्रमिकों को सिलिकोसिस बीमारी के कारणों और लक्षणों के बारे में जानकारी तो है परन्तु श्रमिको के निवास क्षेेत्र के समीप रोजगार के अन्य साधनों की कमी के कारण वे खनन/पत्थर कटाई, घिसाई एवं घडाई के कार्यों से जुड जाते हैं।

- सिलिकोसिस बीमारी से श्रमिक की मृत्यु उपरांत आश्रित परिवार को योजनान्तर्गत दिए जाने वाले लाभों की जानकारी में कमी पायी गयी। कई परिवारों द्वारा श्रमिक की मृत्यु के एक वर्ष से अधिक अवधि तक भी योजनानतर्गत लाभ प्राप्ति के लिए आवेदन नहीं किया गया।

- सिलिकोसिस रोग से पीडित श्रमिकोंं को योजनान्तर्गत प्रमाण पत्र बनवाने से लेकर सहायता राशि दिलाने तक में बिचौलिये/दलाल सक्रिय रहते हैं।

-ऐसे भी श्रमिक/मृतक श्रमिक परिवार सामने आए जिन्होंने योजनान्तर्गत प्रावधानानुसार पंजीकरण तो करवा लिया परन्तु उनको सहायता राशि निर्धारित समय पर भी प्राप्त नहीं हुई। सिलिकोसिस के पुराने पोर्टल से नये पोर्टल पर श्रमिकों के डेटा स्थानान्तरण के कारण भी श्रमिकों को राशि भुगतान मेें देरी हो रही है।

-अनेक स्थानों पर श्रमिकों द्वारा बिना किसी सुरक्षा/उपकरण/उपाय अर्थात बिना डस्ट/फेस मास्क पहने, पत्थरों की सूखी ड्रिलिंग कटाई, घडाई/तुडाई करना पाया गया। जिन कार्यस्थलों पर पत्थर कटाई, घडाई, घिसाई का कार्य अधिक मात्रा में किया जाता है वहां जल छिडकाव प्रणाली/पानी केे फव्वारा का प्रयोग अनिवार्य रूप सेे किया जाना चाहिए, लेकिन यह सुविधा नहीं मिली।

- अनेक स्थानों पर देय सहायता में कर्मचारियों और दलालों की मिलीभत सामने आई। इसके जरिए सिलिकोसिस के फर्जी प्रमाण पत्र बनाए जाने का मामले भी दिखे।

- कार्यस्थलों पर नियमानुसार चिकित्सा सुविधाओं की कमी, श्रमिकों की नियमित स्वास्थ्य जांच नहीं कराए जाने और चिकित्सा शिविरों का आयोजन नहीं किए जाने की शिकायतें भी मिलीं।

- यह भी पाया गया कि श्रमिकों को ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं होती और दलातों या एजेंटों से काम कराना उनकी मजबूरी हो जाता है। इसके अलावा ऑनलाइन आवेदनों की स्वीकृति में भी समय लगता है।

- कार्यस्थलों के पास नशीले पदार्थ भी बडी मात्रा में बिकते पाए गए, जबकि इनके सेवन से सिलिकोसिस रोग तेज गति से प्रभावित करता है।

- यह भी सामने आया कि कई खदानें श्रम और रोजागार विभाग, खनन विभाग और उद्योग विभाग में पंजीकृत नहीं है और एसएमएफटी/डीएमएफटी फण्ड में आर्थिक सहयोग नहीं करते।

- यह भी पाया गया कि योजना से सम्बन्धित अन्य विभाग जैसे चिकित्सा विभाग, श्रम विभाग, खनन विभाग आदि से श्रमिकों को यथासमय वांछित जानकारी एवं सहयोग प्राप्त करने में परेशानी आती है।



यह होता है सिलिकोसिस रोग
सिलिकोसिस फेफडों की बीमारी है जो सिलिका मिश्रित धूल भरे वातावरण में लगातार लम्बे समय तक काम करने से होती है। यह कण फेफडों को प्रभावित कर गांठ बना देते हैं। इससे फेफड़ों की कार्य क्षमता में कमी आ जाती है। खनन, पत्थर तोडऩे, पत्थर पीस कर पाउडर बनाने, गिट्टी बनाने, मूर्ति बनाने, काँच व चीनी मिट्टी के बर्तन बनाने, ज्वैलरी, स्लेट/चॉक पेन्सिल निर्माण, सिरेमिक टाईल्स बनाना, सीमेंट बनाने आदि के कामों में यह रोग होने की सम्भावना रहती है।

ये भी पढ़ें - अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे

Advertisement
Khaskhabar Rajasthan Facebook Page:
Advertisement
Advertisement