RERA cracks down on builder: RSR Elite Developers to pay additional damages and penalties in addition to refund interest-m.khaskhabar.com
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बिल्डर पर रेरा का प्रहार: आरएसआर एलीट डेवलपर्स को रिफंड ब्याज के अलावा देना होगा अतिरिक्त हर्जाना और पेनल्टी

khaskhabar.com: बुधवार, 22 जुलाई 2026 4:24 PM (IST)
बिल्डर पर रेरा का प्रहार: आरएसआर एलीट डेवलपर्स को रिफंड ब्याज के अलावा देना होगा अतिरिक्त हर्जाना और पेनल्टी
खास खबर। जयपुर राजस्थान रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RAJ-RERA) के एडजुडिकेटिंग ऑफिसर ने अधर में लटके प्रोजेक्ट्स के प्रमोटरों की जवाबदेही तय करते हुए घर खरीदारों के हक में एक और बड़ा व राहतकारी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि प्रमोटर द्वारा समय पर आशियाना न सौंपने की स्थिति में आवंटी केवल साधारण ब्याज ही नहीं, बल्कि बाजार की दरों के आधार पर अतिरिक्त मुआवजा पाने का भी पूर्ण हकदार है।
न्यायनिर्णायक अधिकारी आर.एस. कुलहारी ने 'अवध होम्स' प्रोजेक्ट के प्रमोटर मैसर्स आरएसआर एलीट डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड' की लापरवाही पर नाराजगी जताते हुए रेरा अथॉरिटी द्वारा पूर्व में तय 11.10% ब्याज के अलावा 1% अतिरिक्त वार्षिक ब्याज और ₹70,000 का एकमुश्त हर्जाना देने का आदेश जारी किया है।
यह पूरा कानूनी मामला आवंटी परमजीत कौर बिंद्रा एवं अन्य द्वारा दायर विधिक शिकायत से जुड़ा है। आवंटियों ने इस प्रोजेक्ट में ₹19,00,000 की कुल कीमत पर फ्लैट नंबर 316 बुक किया था और समय-समय पर रजिस्ट्रेशन शुल्क सहित कुल ₹5,02,800 का भुगतान बिल्डर को कर दिया था। दोनों पक्षों के बीच 13 जून 2018 को विक्रय समझौता निष्पादित हुआ, जिसके तहत प्रमोटर को 15 नवंबर 2021 तक फ्लैट का भौतिक कब्जा सौंपना अनिवार्य था। तय तारीख बीतने के बाद भी जब निर्माण ठप रहा, तो पीड़ितों ने रेरा का दरवाजा खटखटाया।
रेरा अथॉरिटी ने 3 दिसंबर 2024 के अपने आदेश में पाया था कि बिल्डर ने इतने सालों में केवल 30% निर्माण किया है और प्रोजेक्ट डिफ़ॉल्ट होकर 'लैप्स' श्रेणी में पड़ा हुआ है। अथॉरिटी ने जमा राशि को 11.10% वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया था। इसके बाद आवंटियों ने अतिरिक्त मुआवजे के लिए न्यायनिर्णायक फोरम में याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान बिल्डर के वकील ने 'अपरिहार्य परिस्थितियों' और कोरोना काल का हवाला देते हुए केस को समय-बाधित बताकर खारिज करने की दलील दी।
रेरा कोर्ट ने बिल्डर के इन बहानों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि केवल अस्पष्ट बातें कहकर बरसों की देरी को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 'एक्सपिरियन डेवलपर्स बनाम सुष्मा अशोक शिरूर' केस के नजीर का हवाला देते हुए 'रेस्टीट्यूशन' (मूल स्थिति में बहाली) के सिद्धांत को लागू किया। कोर्ट ने माना कि खरीदारों ने रिश्तेदारों व बाजार से कर्ज लेकर पैसा जुटाया था। बाजार या वित्तीय संस्थानों में ब्याज दरें 12% से अधिक होती हैं, जबकि रेरा अथॉरिटी ने केवल 11.10% ब्याज दिया था। इस 1% के अंतर को कोर्ट ने सीधा वित्तीय नुकसान मानते हुए मुआवजे के रूप में देने योग्य पाया।
न्यायनिर्णायक अधिकारी आर.एस. कुलहारी ने प्रमोटर को निर्देश दिए हैं कि प्रमोटर जमा कराई गई पूरी राशि पर प्रत्येक जमा तिथि से रिफंड की तारीख तक 1% वार्षिक दर से अतिरिक्त साधारण ब्याज (मुआवजे के रूप में) का भुगतान करे। आवंटी को अपने घर के सुख से वंचित करने, मानसिक परेशानी देने के लिए ₹50,000 और मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में ₹20,000 (कुल ₹70,000) का एकमुश्त हर्जाना दिया जाए।
बिल्डर को इस आदेश की पालना 45 दिनों के भीतर करनी होगी। यदि प्रमोटर समय-सीमा में विफल रहता है, तो उसे इस पूरी अवार्डेड राशि पर फैसले के दिन से भुगतान तक 6% वार्षिक दर से अतिरिक्त ब्याज भी चुकाना पड़ेगा।

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