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khaskhabar.com: शुक्रवार, 14 नवम्बर 2025 7:21 PM (IST)
राजस्थान में अंता उप चुनाव का रिजल्ट आ चुका है। कांग्रेस ने अप्रत्याशित रूप से प्रदर्शन करते हुए परिणामों से चौंकाया है। अप्रत्याशित रूप से इसलिए कि सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा से लेकर अधिकांश राजनीतिज्ञ और ब्यूरोक्रेट्स मानकर चल रहे थे कि परिणाम भाजपा के पक्ष में जाएगा। इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा था कि निर्दलीय प्रत्याशी नरेश मीणा जो भी वोट लेंगे, वे कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचाएंगे।
दूसरे भाजपा की ओर से आखिरी चरण में चुनाव प्रचार में ताकत भी दिखाई गई थी। मौजूदा मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे और प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ से लेकर कई मंत्री सक्रिय रहे। इसके बावजूद अपेक्षित परिणाम न मिलना सरकार और भाजपा को करारा झटका ही माना जाएगा। क्योंकि आमतौर पर उप चुनावों में परिणाम सत्तारूढ़ दल के पक्ष में ही जाते हैं।
इसकी वजह यह है कि सत्तारूढ़ दल को यहां सरकार का भरपूर सहयोग मिलता है, वहीं आम वोटर की भी मानसिकता यही रहती है कि अगर सत्तारुढ़ दल का विधायक या सांसद जीतेगा तो क्षेत्रीय विकास के काम ज्यादा होंगे। व्यक्तिगत काम करवाने में भी क्षेत्रीय लोगों को आसानी रहेगी। अगर अब तक हुए 8 उप चुनावों के परिणाम देखें तो जहां झुंझुनूं, देवली-उनियारा, खींवसर, रामगढ़ और सलूंबर में सत्तारूढ़ भाजपा ने अपनी जीत दर्ज कराई है, वहीं दौसा एवं अंता में कांग्रेस और चौरासी में भारत आदिवासी पार्टी ने उप चुनाव जीते हैं।
यह अलग बात है कि बारां-अंता उप चुनाव को लेकर शुरू से ही यह खबरें आने लगी थीं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अंता समेत अधिकांश उप चुनावों में सीटें हारना चाहता है। भाजपा शीर्ष नेतृत्व का फोकस केवल बिहार के चुनाव पर था। बिहार जीतना भाजपा की पहली प्राथमिकता थी। दूसरी वजह यह भी थी कि जब विपक्ष अपनी करारी हार के लिए ईवीएम मशीनों और चुनाव आयोग को दोषी ठहराएगा तो भाजपा के प्रवक्ताओं और नेताओं के पास यह तर्क मौजूद रहे कि फिर उप चुनाव वे लोग कैसे हार गए। ईवीएम के जरिए तो सारे उप चुनाव भी जीत सकते थे। वैसे भी राजस्थान अंता उप चुनाव की हार-जीत से भाजपा और भजन लाल सरकार पर कोई खास प्रभाव पड़ने वाला नहीं था। क्योंकि सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त है और अगले विधानसभा चुनावों में अभी 3 साल बाकी हैं।
लेकिन, विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो बारां अंता उप चुनाव के परिणाम से भाजपा की अंदरूनी राजनीति गर्माने के साथ ही कलह बढ़ सकती है। जाहिर, विरोधी खेमा इस हार के लिए सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधराराजे को ही जिम्मेदार ठहराएगा। क्योंकि यह उनके निर्वाचन क्षेत्र का मामला है। वे लंबे समय से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनके सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह यहां के चुनाव प्रभारी भी थे। प्रत्याशी भी वसुंधराराजे की सहमति से ही घोषित किया गया था।
चूंकि वे दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, इसलिए भी इस हार की ज्यादा जिम्मेदारी उन पर डालने की कोशिश की जाएगी। इसके साथ ही संगठन की कमजोरी के लिए प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ को भी यह कहकर जिम्मेदार ठहराया जा सकता है कि स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं ने चुनाव में मन से काम नहीं किया। क्योंकि क्षेत्रीय नेता और मंत्री मदन दिलावर, डॉ. किरोड़ीलाल मीणा और हीरालाल नागर चुनाव प्रचार में ज्यादा सक्रिय नजर नहीं आए।
लेकिन, वसुंधराराजे खेमा यह कहकर भजन लाल सरकार पर हमलावर हो सकता है कि पहले और दूसरे साल में ही सरकार की छवि नकारात्मक हो गई है। तमाम प्रयासों के बावजूद भजन लाल सरकार अपनी नकारात्मक छवि को नहीं तोड़ पा रही है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का बयान कि दो साल में ही भाजपा सरकार पर एंटी इंकमबेंसी हावी हो गई है, उनके लिए संजीवनी का काम करेगा। खासकर ऐसे समय में जब मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चाएं जोरों पर हैं।
मुख्य सचिव सुधांश पंत के दिल्ली लौटने के बाद सत्ता के गलियारों में जिस तरह की चर्चाएं चल रही हैं, वे भी भजन लाल सरकार के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती है। खैर, बात चाहे जो भी हो। लेकिन, भाजपा के सभी पक्षों के लिए यह गहनता से चिंतन करने का विषय है कि बंद मुट्ठी लाख की और खुली मुट्ठी खाक की यानि एकजुट रहने में ही सभी को लाभ हो सकता है।
अंता उप चुनाव के संबंध निर्दलीय प्रत्याशी नरेश मीणा का उल्लेख करना जरूरी है कि परिणाम चाहे जो भी रहा हो। लेकिन, नरेश मीणा ने इस बात को साबित करके दिखाया है कि उन्होंने चुनाव को हल्के में नहीं लिया बल्कि पूरी गंभीरता और मेहनत के साथ चुनाव लड़ा। परिणाम उनके पक्ष में आएगा, इसकी संभावना ना के बराबर ही लग रही थी, क्योंकि नरेश मीणा के बड़े बोल, गुस्सा और असभ्य व्यवहार खुद उनके लिए आत्मघाती साबित हो गया। यह समय नरेश मीणा के लिए भी आत्मचिंतन का है। अगर, उन्हें भविष्य में विधानसभा में प्रवेश करना है तो अपने व्यवहार में परिवर्तन करने के साथ ही वाणी पर भी नियंत्रण करना होगा।
अगर बात करें कांग्रेस की तो अंता उप चुनाव की जीत का श्रेय लेने की नेताओं में होड़ मच चुकी है। प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा जहां जीत का सेहरा अपने सिर बांधना चाह रहे हैं, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इस जीत का श्रेय लेने का प्रयास किया है। लेकिन, गहलोत से यह सवाल स्वाभाविक रूप से पूछा जा सकता है कि अगर उनका वोटरों में इतना ही प्रभाव है तो बिहार इतनी बुरी तरह से क्यों हारे। जबकि मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने तो वे ही गए थे। दूसरी बात, अगर पिछला विधानसभा चुनाव सचिन पायलट, डोटासरा के साथ मिलकर ईमानदारी से लड़ा होता तो शायद उन्हें सत्ता नहीं गंवानी पड़ती।
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राजस्थान का अंता उपचुनाव : भजन लाल सरकार और भाजपा को करारा झटका

यह अलग बात है कि बारां-अंता उप चुनाव को लेकर शुरू से ही यह खबरें आने लगी थीं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अंता समेत अधिकांश उप चुनावों में सीटें हारना चाहता है। भाजपा शीर्ष नेतृत्व का फोकस केवल बिहार के चुनाव पर था। बिहार जीतना भाजपा की पहली प्राथमिकता थी। दूसरी वजह यह भी थी कि जब विपक्ष अपनी करारी हार के लिए ईवीएम मशीनों और चुनाव आयोग को दोषी ठहराएगा तो भाजपा के प्रवक्ताओं और नेताओं के पास यह तर्क मौजूद रहे कि फिर उप चुनाव वे लोग कैसे हार गए। ईवीएम के जरिए तो सारे उप चुनाव भी जीत सकते थे। वैसे भी राजस्थान अंता उप चुनाव की हार-जीत से भाजपा और भजन लाल सरकार पर कोई खास प्रभाव पड़ने वाला नहीं था। क्योंकि सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त है और अगले विधानसभा चुनावों में अभी 3 साल बाकी हैं।
लेकिन, विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो बारां अंता उप चुनाव के परिणाम से भाजपा की अंदरूनी राजनीति गर्माने के साथ ही कलह बढ़ सकती है। जाहिर, विरोधी खेमा इस हार के लिए सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधराराजे को ही जिम्मेदार ठहराएगा। क्योंकि यह उनके निर्वाचन क्षेत्र का मामला है। वे लंबे समय से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनके सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह यहां के चुनाव प्रभारी भी थे। प्रत्याशी भी वसुंधराराजे की सहमति से ही घोषित किया गया था।
चूंकि वे दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, इसलिए भी इस हार की ज्यादा जिम्मेदारी उन पर डालने की कोशिश की जाएगी। इसके साथ ही संगठन की कमजोरी के लिए प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ को भी यह कहकर जिम्मेदार ठहराया जा सकता है कि स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं ने चुनाव में मन से काम नहीं किया। क्योंकि क्षेत्रीय नेता और मंत्री मदन दिलावर, डॉ. किरोड़ीलाल मीणा और हीरालाल नागर चुनाव प्रचार में ज्यादा सक्रिय नजर नहीं आए।
लेकिन, वसुंधराराजे खेमा यह कहकर भजन लाल सरकार पर हमलावर हो सकता है कि पहले और दूसरे साल में ही सरकार की छवि नकारात्मक हो गई है। तमाम प्रयासों के बावजूद भजन लाल सरकार अपनी नकारात्मक छवि को नहीं तोड़ पा रही है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का बयान कि दो साल में ही भाजपा सरकार पर एंटी इंकमबेंसी हावी हो गई है, उनके लिए संजीवनी का काम करेगा। खासकर ऐसे समय में जब मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चाएं जोरों पर हैं।
मुख्य सचिव सुधांश पंत के दिल्ली लौटने के बाद सत्ता के गलियारों में जिस तरह की चर्चाएं चल रही हैं, वे भी भजन लाल सरकार के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती है। खैर, बात चाहे जो भी हो। लेकिन, भाजपा के सभी पक्षों के लिए यह गहनता से चिंतन करने का विषय है कि बंद मुट्ठी लाख की और खुली मुट्ठी खाक की यानि एकजुट रहने में ही सभी को लाभ हो सकता है।
अंता उप चुनाव के संबंध निर्दलीय प्रत्याशी नरेश मीणा का उल्लेख करना जरूरी है कि परिणाम चाहे जो भी रहा हो। लेकिन, नरेश मीणा ने इस बात को साबित करके दिखाया है कि उन्होंने चुनाव को हल्के में नहीं लिया बल्कि पूरी गंभीरता और मेहनत के साथ चुनाव लड़ा। परिणाम उनके पक्ष में आएगा, इसकी संभावना ना के बराबर ही लग रही थी, क्योंकि नरेश मीणा के बड़े बोल, गुस्सा और असभ्य व्यवहार खुद उनके लिए आत्मघाती साबित हो गया। यह समय नरेश मीणा के लिए भी आत्मचिंतन का है। अगर, उन्हें भविष्य में विधानसभा में प्रवेश करना है तो अपने व्यवहार में परिवर्तन करने के साथ ही वाणी पर भी नियंत्रण करना होगा।
अगर बात करें कांग्रेस की तो अंता उप चुनाव की जीत का श्रेय लेने की नेताओं में होड़ मच चुकी है। प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा जहां जीत का सेहरा अपने सिर बांधना चाह रहे हैं, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इस जीत का श्रेय लेने का प्रयास किया है। लेकिन, गहलोत से यह सवाल स्वाभाविक रूप से पूछा जा सकता है कि अगर उनका वोटरों में इतना ही प्रभाव है तो बिहार इतनी बुरी तरह से क्यों हारे। जबकि मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने तो वे ही गए थे। दूसरी बात, अगर पिछला विधानसभा चुनाव सचिन पायलट, डोटासरा के साथ मिलकर ईमानदारी से लड़ा होता तो शायद उन्हें सत्ता नहीं गंवानी पड़ती।
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