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नगर निगम चुनाव: सामान्य सीटों पर मुस्लिम चेहरों से भाजपा के कोर वोटर में उबाल, उपेक्षा से सिंधी समाज भी खफा

पार्टी ने लीक से हटते हुए वार्ड-19 से श्रीमती शाहनवाज अंसारी (सामान्य), वार्ड-109 से जाकिर खान कायमखानी (सामान्य), वार्ड-113 से फरीदुद्दीन जैकी (ओबीसी), वार्ड-117 से श्रीमती शबाब जहाँ (सामान्य महिला), वार्ड-128 से माजिद पठान (सामान्य), वार्ड-136 से श्रीमती मिजाना मिर्जा (सामान्य महिला), वार्ड-137 से रहीस मंसूरी (सामान्य) और वार्ड-146 से श्रीमती अफसाना (ओबीसी महिला) को मैदान में उतारा है।
रणनीतिकार इसे अल्पसंख्यक बहुल पॉकेट्स में पार्टी की मौजूदगी दर्ज कराने और नए जनाधार की तलाश बता रहे हैं, मगर पार्टी के निष्ठावान हिंदू मतदाताओं और वर्षों से जमीन पर दरी-पट्टी बिछाने वाले कैडर में इसे लेकर गहरा असमंजस है। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि जिन इलाकों में परंपरागत रूप से पार्टी का वोट बैंक बेहद सीमित रहा है, वहाँ सामान्य सीटों पर कार्यकर्ताओं की दावेदारी दरकिनार किए जाने से बूथ स्तर का कार्यकर्ता घर बैठने को मजबूर हो सकता है, जिसका प्रतिकूल असर न सिर्फ इस स्थानीय निकाय चुनाव, बल्कि आगे चलकर विधानसभा और लोकसभा के बूथ प्रबंधन पर भी पड़ना तय है।
असंतोष केवल यहीं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जयपुर के सामाजिक ताने-बाने के मजबूत घटकों में भी टिकटों के अनुपात को लेकर भारी नाराजगी के सुर उभरने लगे हैं। भाजपा का मजबूत और वफादार आधार माना जाने वाला सिंधी समाज 150 वार्डों के इस बड़े चुनावी समर में अपनी मौजूदगी को बेहद सीमित पा रहा है। समाज के खाते में महज वार्ड-42 से अशोक रावतानी (ओबीसी), वार्ड-75 से पूजा संन्मुखानी (ओबीसी महिला) के रूप में गिनी-चुनी सीटें ही आई हैं। इतने कम प्रतिनिधित्व से सिंधी समाज के भीतर उपेक्षा की भावना घर कर रही है। जबकि सिंधी समाज भाजपा का कोर वोटर माना जाता रहा है।
यही स्थिति माली-सैनी समाज और स्वर्णकार समाज की भी है, जहाँ स्थानीय स्तर पर प्रतिनिधित्व के नाम पर असंतोष खुलकर सामने आ रहा है। उधर, सवर्ण समाज भी नीतिगत स्तर पर यूजीसी जैसे अहम मुद्दों को लेकर पहले से ही वैचारिक मंथन में जुटा था, और अब टिकट वितरण में उम्मीद के मुताबिक तवज्जो न मिलने से प्रबुद्ध तबके की नाराजगी और गाढ़ी होती दिख रही है। 150 वार्डों के गणित में सामान्य वर्ग की 64 और 29 महिला सीटों, ओबीसी की 31 (21 पुरुष, 10 महिला), एससी की 19 (14 पुरुष, 5 महिला) और एसटी की 6 (5 पुरुष, 1 महिला) सीटों का आरक्षण ढांचा मौजूद है।
ऐसे में चुनावी विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि अगर पार्टी अपने कोर वोटर और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की नाराजगी को समय रहते पाटने में नाकाम रही, तो यह नया राजनीतिक प्रयोग लाभ के बजाय भीतरघात और उदासीनता का कारण बन सकता है। स्थानीय निकाय चुनाव पूरी तरह से वार्ड स्तर की सक्रियता और कैडर की ऊर्जा पर टिके होते हैं; ऐसे में यदि संगठन का सिपाही ही हाशिए पर महसूस करेगा, तो विपक्षी खेमे के लिए राहें आसान हो सकती हैं। अब देखना यह होगा कि डैमेज कंट्रोल की कवायद में नेतृत्व अपने नाराज कुनबे को मना पाता है या यह आंतरिक तपिश चुनावी नतीजों को झुलसाएगी।
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