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हिंदी दिवस का संदेश : मातृभाषा में शिक्षा ही वास्तविक प्रगति

कोठारी आयोग (1964-66) ने सुझाव दिया था कि आदिवासी क्षेत्रों में प्रारंभिक वर्षों में शिक्षा स्थानीय जनजातीय भाषा में होनी चाहिए। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (2009) में भी यह प्रावधान किया गया कि जहां तक संभव हो, शिक्षा का माध्यम बच्चे की मातृभाषा हो। आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि अभिभावक अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को ही श्रेष्ठ मानते हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में माता-पिता बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में भेजने की होड़ में लगे रहते हैं। वे मानते हैं कि अंग्रेजी ही सफलता की कुंजी है। शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दिए बिना केवल "अंग्रेजी" को प्राथमिकता दी जाती है।
ग्रामीण भारत में निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में दाखिले की संख्या तेजी से बढ़ रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि भाषा कभी भी सफलता की गारंटी नहीं हो सकती। असली सफलता अच्छी शिक्षा, आत्मविश्वास और ज्ञान पर आधारित होती है। यदि बच्चे को ऐसी भाषा में शिक्षा दी जाए जिसे वह समझ ही नहीं पाता, तो न तो उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा और न ही वह शिक्षा का सही लाभ ले पाएगा। मातृभाषा में शिक्षा देने के अनेक लाभ हैं। बच्चा उसी भाषा में आसानी से सोच सकता है जो उसकी मातृभाषा है। अपनी भाषा में सीखने से भयमुक्त वातावरण मिलता है और आत्मविश्वास बढ़ता है। मातृभाषा में शिक्षा से बच्चा अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा रहता है।
जब शिक्षा सरल और बोधगम्य होगी तो बच्चे स्कूल छोड़ेंगे नहीं। मातृभाषा में सोचने और व्यक्त करने से सृजनात्मक क्षमता भी विकसित होती है। लेकिन इस व्यवस्था को लागू करने में कई व्यावहारिक समस्याएँ सामने आती हैं। भारत में भाषाओं और बोलियों की बहुत अधिक विविधता है। कई भाषाओं के पास मानकीकृत लिपि या पर्याप्त शिक्षण सामग्री नहीं है। प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी है, जो बहुभाषी कक्षाओं को संभाल सकें। नई पुस्तकों और प्रशिक्षण पर अतिरिक्त खर्च आएगा। साथ ही, अभिभावकों की मानसिकता भी एक बड़ी चुनौती है जो अंग्रेजी को ही श्रेष्ठ मानती है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे।
बहुभाषी शिक्षा के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएँ। मातृभाषाओं में गुणवत्तापूर्ण किताबें तैयार की जाएँ। अभिभावकों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जाएँ ताकि वे समझें कि मातृभाषा में शिक्षा बच्चों के लिए अधिक लाभकारी है। विभिन्न राज्यों में मातृभाषा आधारित शिक्षा के प्रयोग किए जाएँ और उनकी सफलता के आधार पर आगे बढ़ा जाए। डिजिटल शिक्षा सामग्री को भी स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए।
दुनिया के कई देशों में मातृभाषा में शिक्षा को प्राथमिकता दी जाती है। फिनलैंड की शिक्षा प्रणाली विश्व में सर्वोत्तम मानी जाती है और वहां प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा पर ही जोर दिया जाता है। जापान और दक्षिण कोरिया ने अपनी भाषा में शिक्षा देकर विश्व स्तर पर आर्थिक और तकनीकी प्रगति हासिल की। यूनैस्को भी लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए। हिंदी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि अपनी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और पहचान का आधार है। यदि हम चाहते हैं कि नई पीढ़ी आत्मविश्वासी, ज्ञानवान और रचनात्मक बने तो हमें शिक्षा में मातृभाषा का स्थान सुनिश्चित करना होगा। हिंदी सहित सभी मातृभाषाओं का सम्मान करना आवश्यक है।
मातृभाषा में शिक्षा देने का विचार कोई नया नहीं है, लेकिन इसे व्यावहारिक रूप से लागू करने की ज़रूरत है। अंग्रेजी का महत्व अपनी जगह है, लेकिन प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही सबसे प्रभावी सिद्ध हो सकती है। हमें यह धारणा तोड़नी होगी कि केवल अंग्रेजी माध्यम से ही सफलता मिलती है। सफलता का असली आधार है— ज्ञान, समझ और आत्मविश्वास। इस हिंदी दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी भाषा और संस्कृति के महत्व को पहचानेंगे, अभिभावकों को जागरूक करेंगे और बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। यही वास्तविक राष्ट्र निर्माण की दिशा में हमारा योगदान होगा।
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