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मकर संक्रांतिः लोहड़ी, पोंगल, बिहू से उत्तरायण का स्वागत

khaskhabar.com: मंगलवार, 13 जनवरी 2026 11:03 PM (IST)
मकर संक्रांतिः लोहड़ी, पोंगल, बिहू से उत्तरायण का स्वागत
कर संक्रांति 14 जनवरी को देशभर में मनाई जाती है यह मात्र एक त्योहार नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक, रबी फसल का स्वागत, वात पित्त नाशक जैसे कई पहलू हैं। इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते ही उत्तरायण के हो जाते हैं, शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का काल कहा गया है। सूर्य के उत्तरायण होने का अर्थ स्वर्ग के द्वार खुलना भी माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, जिन लोगों की मृत्यु उत्तरायण के सूर्य में होती है, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है,जबकि दक्षिणायन के सूर्य में प्राण त्यागने वालों को पुनर्जन्म लेना पड़ता है इसीलिए भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति के दिन,यानी सूर्य के उत्तरायण होने पर अपने प्राण त्यागे थे, इसे भीष्माष्टमी के रूप में भी मनाया जाता है,भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त होने के बावजूद मोक्ष प्राप्ति के लिए उन्होंने उत्तरायण काल का इंतज़ार किया था। भारत देश त्योहारों का देश है और यह हर त्यौहार हर्षोल्लास के साथ मनाता है सभी ऋतु का स्वागत भी यह बहुत धूम धाम से करता है, ऐसे ही मकर संक्रांति के अवसर पर पश्चिम बंगाल के गंगासागर स्थित कपिल मुनि आश्रम में विशाल धार्मिक मेला आयोजित होता है। गंगासागर मेला कुंभ मेले के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा हिंदू धार्मिक मेला माना जाता है।
14 जनवरी से भारत में मकर संक्रांति का फसल उत्सव शुरू होता है, जो नए साल, सूर्य के उत्तरायण होने और रबी फसलों के आगमन का प्रतीक है, जिसे देश के अलग अलग हिस्सों में लोहड़ी, पोंगल, बिहू जैसे नामों से मनाते हैं, जिसमें तिल-गुड़ के पकवान, पतंगबाजी और पवित्र स्नान जैसी परंपराएं होती हैं, जिससे खुशी और समृद्धि आती है। इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तर दिशा की ओर अपनी यात्रा (उत्तरायण) शुरू करता है, इसलिए इसे उत्तरायण भी कहते हैं। मकर संक्रांति से शबरीमला की आध्यात्मिक परंपरा भी जुड़ी हुई है।
केरल में स्थित शबरीमला अयप्पा स्वामी का पवित्र तीर्थक्षेत्र मंडल काल की समाप्ति के बाद मकर संक्रांति के दिन विशेष भक्ति के साथ भक्तों के लिए खोला जाता है। भक्तों की आस्था के अनुसार मकरविलक्कु को दिव्य ज्योति के रूप में पूजा जाता है। स्वामी शरणं अयप्पा के जयघोष के साथ लाखों श्रद्धालु भगवान अयप्पा के दर्शन करते हैं। 41 दिनों के व्रत, सात्विक जीवन और आत्मसंयम के माध्यम से भक्त मकर संक्रांति को केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और साधना के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।
जब सूर्य कर्क रेखा (कर्क) से मकर रेखा (मकर) की ओर बढ़ता है और सर्दियों के संक्रांति को पार करता है। 13 जनवरी को भोगी से शुरू होने वाला यह त्यौहार शिशिर ऋतु (सर्दियों के अंत) से वसंत ऋतु (वसंत) की ओर बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। सूर्य का अस्तित्व, गति और ब्रह्मांड में स्थितियाँ हमारी सर्कैडियन लय में एक प्रमुख भूमिका निभाती हैं, इसलिए यह संक्रमण आयुर्वेद ऋतुचर्या या मौसमी आहार में महत्वपूर्ण है। जब सूर्य कर्क रेखा (कर्क) से मकर रेखा (मकर) की ओर बढ़ता है और सर्दियों के संक्रांति को पार करता है। गुड़ मीठा और गर्म होता है। इस मौसम में इसका सेवन करने से वात दूर होता है। देश के विभिन्न भागों में तो लोग इस दिन कड़ाके की ठंड के बावजूद रात के अंधेरे में ही नदियों में स्नान शुरू कर देते हैं।
इलाहाबाद के त्रिवेणी संगम, वाराणसी में गंगाघाट, हरियाणा में कुरुक्षेत्र, राजस्थान में पुष्कर और महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी में श्रद्धालु इस अवसर पर लाखों की संख्या में एकत्रित होते हैं। इस पर्व पर इलाहाबाद में लगने वाला माघ मेला और कोलकाता में गंगासागर के तट पर लगने वाला मेला काफी प्रसिद्ध है। अयोध्या में भी इस पर्व की खूब धूम रहती है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पवित्र सरयू में डुबकी लगाकर रामलला, हनुमानगढ़ी में हनुमानलला तथा कनक भवन में मां जानकी की पूजा अर्चना करते हैं।
हरिद्वार में भी इस दौरान मेला लगता है जिसमें हजारों श्रद्धालुओं की आस्था के मंजर को देखा जाता है। मकर संक्रांति के दिन दान पुण्य का भी बहुत महत्व है दान पुण्य दर्शाता है कि जीवन में खुशियों को लोगों के साथ मिलकर मनाया जाता है इससे धन समृद्धि बढ़ती है इसीलिए कहा जाता है कि परोपकार सबसे बड़ा पुण्य और पर पीड़ा यानी दूसरों को कष्ट देना सबसे बड़ा पाप है।

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