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अपनी बारी का इंतज़ार करते महादलित और अति पिछड़ा

आरक्षण को लेकर बहस एक बार फिर मुखर है। रोचक बात यह है कि इस बार आरक्षण प्राप्त करने को लेकर या आरक्षण बचाने को लेकर बहस नहीं हो रही है। बहस इस बात पर तीव्र है कि अनुसूचित जाति -जनजाति को जो आरक्षण दिया जा रहा है क्या उसका लाभ इस वर्ग की सभी जातियों को मिल रहा है ? या इस वर्ग में आने वाली कुछ जातियां ही बाबा साहब भीमराव आंबेडकर द्वारा संविधान में प्रदत्त इस व्यवस्था का लाभ ले रही हैं ? इसमें भी रोचक तथ्य यह है कि यह मांग करने वाला वर्ग आरक्षण के लाभार्थी वर्ग में से नहीं है यानि कोई दलित या आदिवासी नहीं है अपितु सवर्ण समाज के बुद्धिजीवी हैं।
दरअसल जो माँग सवर्ण समाज की तरफ़ से उठ रही है, यह माँग आरक्षण के लाभार्थी वर्ग से ही उठनी चाहिए थी। आरक्षित वर्ग में विषमताओं का सबसे ज़्यादा असर इन्हीं को उठाना पड़ रहा है। जिन लोगों को आरक्षण का लाभ मिल चुका है वो अपनी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति में बदलाव के बावजूद आरक्षण का मोह त्यागने को तैयार नहीं हैं। इसीलिए वंचित वर्ग के बीच में ही महादलित और अतिपिछड़ा जैसा अलग से वर्ग बन गया है। ये दोनों ही वर्ग ऐसी जातियों के समूह के रूप में उभर कर सामने आए हैं जिनको उनके समुदाय से सहारे की सबसे ज़्यादा जरूरत थी।
विडम्बना यह है कि समाज के जिस वर्ग पर मनुवादी होने और आरक्षण को समाप्त कर देने का षड्यंत्र रचने के आरोप लग रहे हैं, वही वर्ग अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिए प्रयास करता दिखाई देता है। दरअसल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत भारत के राष्ट्रपति विशिष्ट जातियों को अनुसूचित जाति या जनजाति के रूप में चिह्नित करते हैं। हर राज्य में यह जातियां अलग हो सकती हैं।
संविधान के अनुसार केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वालो को ही आरक्षण का लाभ मिलता है। 2011 की जनसंख्या के अनुसार देश में 16.6 प्रतिशत यानि लगभग बीस करोड़ लोग अनुसूचित जातियों की श्रेणी में आते थे। भारत में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत 28 राज्यों में लगभग 1109 जातियां अनुसूचित जातियां सूचियों में दर्ज हैं। इनमें से कितनी जातियों को आरक्षण का लाभ मिला है ? यह अध्ययन का विषय है। हालांकि केंद्र सरकार या राज्य सरकार ऐसा कोई आंकड़ा प्रकाशित नहीं करती है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि आरक्षित वर्ग में किस समूह को इसका सर्वाधिक लाभ मिला है और किस समाज को आज भी आरक्षण की आवश्यकता है।
राजनीतिक प्रेक्षक यह मानते हैं कि आरक्षण को स्वीकार करने वाली संसद की यह मूल भावना रही होगी कि आरक्षण का लाभार्थी अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार आते ही स्वयंमेव ही आरक्षण को त्याग देगा और धीरे धीरे यह व्यवस्था स्वयं समाप्त हो जाएगी। पर राजनीति की बिसात पर यह अब वोट प्राप्ति का अचूक अस्त्र बन गई है। राजनीतिक दल और राजनेता यह नहीं देखना चाहते कि किन वर्गों तक आरक्षण का लाभ पहुंचना बाकी है, वो तो बस आरक्षण को जस का तस बनाये रखने के पक्ष में हैं, जिससे मतदाता यह माने कि अमुक राजनीतिक दल ही अनुसूचित जाति या जनजाति का सच्चा हितैषी है।
इन सबके बीच यह खबर उत्साह वर्धक है कि संध्या क्षितिज डोंगरे, प्रणव थंबूरने, रविकांत दिवाकर ये वो नाम हैं जिन्होंने नीट -2026 में आरक्षण कोटे में होने के बावजूद भारत की वरीयता में 33, 55 और 77 वाँ स्थान प्राप्त किया। यानि वह दिन दूर नहीं जब अनुसूचित जाति के छात्र आरक्षण की बजाय अपनी योग्यता पर भरोसा करेंगे। लेकिन असली प्रश्न अब भी वहीं खड़ा है कि क्या आरक्षण के लाभार्थी अपने ही समाज के लोगों के लिए आरक्षण का त्याग कर उनको आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से सबल करने का प्रयास करेंगे ? या फिर अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों को भी आरक्षण के वोट बैंक के लिए गिरवी रख देंगे।
नोटः लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट, जयपुर के निदेशक हैं
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