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देश के विद्या मंदिरों में लगते ताले

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित व अन्य हिंदू संगठनों द्वारा संचालित स्कूलों में यह पहले से अधिक प्रचलित है। शिक्षा को लेकर हमारा देश इस समय एक ऐसे दुर्भागयपूर्ण दौर से गुज़र रहा है जबकि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे अनेक लोगों की शिक्षा, उनकी डिग्रियां असली हैं या नक़ली, विधान निर्माता शिक्षित है या अशिक्षित,इसतरह के सवाल उठ रहे हैं। उधर उच्च शिक्षा हासिल करने के लिये संपन्न लोग अपने बच्चों को पहले भी विदेश भेजा करते थे और आज भी भेजते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री व दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्री स्व डॉ मनमोहन सिंह ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से 1957 में अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी ऑनर्स डिग्री हासिल की थी और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से 1962 में डी.फ़िल. की उपाधि ग्रहण की थी।
पंडित जवाहरलाल नेहरू व राजीव गाँधी भी कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। इसी तरह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण,ज्योतिरादित्य सिंधिया,राहुल गांधी,जयराम रमेश ,पी. चिदंबरम,कपिल सिब्बल,सुब्रमण्यम स्वामी,जयंत सिन्हा,रतन टाटा, आनंद महिंद्रा जैसे अनेकानेक राजनेता उद्योगपति व प्रतिष्ठित लोग हारवर्ड,कैम्ब्रिज,ऑक्सफोर्ड या अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से शिक्षा ग्रहण कर चुके हैं। परन्तु हमारे प्रधानमंत्री की नज़रों में शायद इन विश्वविद्यालयों की डिग्रियों या यहाँ की पढ़ाई की उतनी अहमियत नहीं। तभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश में एक चुनावी रैली के दौरान कहा था कि "एक तरफ़ वे लोग हैं जो हार्वर्ड की बात करते हैं, और दूसरी तरफ़ एक ग़रीब का बेटा है, जो अपनी कड़ी मेहनत (Hard work) से अर्थव्यवस्था को सुधारने की कोशिश कर रहा है"।
इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भी उन्होंने तमिलनाडु में एक सभा में कहा था कि देश को विकास के लिए 'हार्वर्ड' की नहीं, 'हार्ड वर्क' की ज़रूरत है। प्रधानमंत्री के अनुसार 'हार्वर्ड' वालों से ज़्यादा दम 'हार्ड वर्क' वालों में है। ज़रा सोचिये कि क्या पढ़ाई करना 'हार्ड वर्क' की श्रेणी में नहीं आता ? जो बच्चा परीक्षा की तैयारी के लिये दिन रात एक किये रहता है,खाना पीना नींद आराम सब कुछ छोड़कर रोज़ 16 -18 घण्टे पढ़ाई करता है वह क्या हार्ड वर्क नहीं है ? निश्चित रूप से शिक्षा के प्रति शीर्ष सत्ता के इसी मनोभाव की वजह से ही आज देश के विद्या मंदिरों पर घोर संकट छाया हुआ है। विगत 10 वर्षों के दौरान भारत में लगभग एक लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। यह कुल सरकारी स्कूलों में लगभग 8% की कमी है।
आज दुर्भाग्यवश देश में सरकारी स्कूल्स की संख्या बढ़ने के बजाये 11.07 लाख से घटकर क़रीब 10.17 लाख हो गयी है। जबकि शुद्ध व्यवसायिक मॉडल वाले मंहगे निजी स्कूलों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। ग़ौरतलब है कि देश के सरकारी स्कूल्स में प्रायः साधारण परिवारों या ग़रीबों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं जिनमें अधिकांश संख्या एस सी ,एस टी,ओ बी सी व अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की होती है। इनमें ज़्यादातर बच्चे किसानों,कामगारों व मेहनतकश मज़दूरों के होते हैं जो वास्तव में शिक्षा के हक़दार भी हैं और शिक्षा उनके भविष्य व जीविकोपार्जन के लिये बेहद ज़रूरी भी है। परन्तु सरकार की विद्या व विद्यालय विरोधी नीतियों के चलते देश में अब तक लगभग 65 लाख बच्चे स्कूल जाना छोड़ चुके हैं।
सरकार द्वारा इस संबंध में यह तर्क दिया जाता है कि छात्रों की अपेक्षित संख्या न होने,संसाधन बचाने और बेहतर शिक्षा के कारण,इंफ्रास्ट्रक्चर व अध्यापकों की कमी या पोस्ट-कोविड प्रभाव कारण अनेक विद्यालयों का विलय पास पड़ोस के गांव में कर दिया गया है। जबकि उनकी दूरी 2 किलोमीटर से 8 किलोमीटर तक है। इतनी दूर बच्चों के स्कूल जाने के लिये न तो सरकार ने कोई उपाय किया है न ही अभिभावकों के पास कोई सामर्थ्य है। ख़ासकर अपनी बच्चियों को वैसे भी कोई मां बाप इतनी दूर के स्कूल नहीं भेजना चाहेगा। ऐसे में इस शिक्षा विरोधी सरकारी नीति के चलते बच्चों के अंधकारमय भविष्य का कौन ज़िम्मेदार है ?
ज़ाहिर है जब यह प्राथमिक शिक्षा ही हासिल नहीं कर सकेंगे तो यह भला हार्वर्ड कैसे जा सकेंगे। और ऐसे में इन्हें प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार 'हार्ड वर्क ' यानी मेहनत मज़दूरी करके ही अपना जीवन यापन करना पड़ेगा। उधर दावा यह भी है कि भारत विश्व गुरु बनेगा। कुछ अति उत्साही लोग तो कह रहे हैं कि भारत विश्व गुरु बन चुका है।
परन्तु लगता है कि वर्तमान सरकार केरल की औसत शिक्षा दर से डरी हुई है ? शायद वह समझ रही है कि आज जो बच्चा पढ़ेगा वही कल सत्ता से सवाल करेगा,अपनी शिक्षित बुद्धि का इस्तेमाल करेगा,तर्क वितर्क करेगा और कुतर्कों के झांसे में नहीं आएगा,अन्धविश्वास विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद करेगा। शायद इसी वजह से देश के विद्या मंदिरों में ताले लगते जा रहे हैं।
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