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जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर ली शपथ, समारोह से शामिल नहीं हुए सीएम मान

पंजाब सरकार का कहना है कि केंद्र ने राज्य की राय का इंतजार किए बिना ही नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। पंजाब सरकार ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गवर्नर से नियुक्ति और शपथ ग्रहण समारोह को टालने का आग्रह किया था। आरोप था कि राज्य सरकार से सलाह-मशविरा करने की तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
हालांकि, केंद्र सरकार ने कहा कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की नियुक्ति 'प्रक्रिया के ज्ञापन' और जजों की नियुक्ति के संवैधानिक तरीके से होती है और इसके लिए राज्य सरकार की सहमति जरूरी नहीं है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (जो उस समय कॉलेजियम के प्रमुख थे) की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 6 अगस्त को जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति की सिफारिश की थी।
जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति से एक अजीब राजनीतिक और संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया था क्योंकि पंजाब सरकार ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के तरीके पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए थे। नियुक्ति के खिलाफ कैबिनेट के प्रस्ताव के बाद मुख्यमंत्री मान ने शपथ ग्रहण समारोह से दूर रहने का फैसला किया।
मौजूदा चीफ जस्टिस शील नागू के सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट होने के बाद जस्टिस मिश्रा 2 जून से पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस के तौर पर काम कर रहे थे। उन्हें जुलाई 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में ट्रांसफर किया गया था। इस घटना ने आप की सरकार और भाजपा की केंद्र सरकार के बीच पहले से ही तनावपूर्ण रिश्तों में एक नया मोड़ ला दिया है।
16 नवंबर 1968 को जन्मे जस्टिस मिश्रा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के किरोड़ीमल कॉलेज से इकोनॉमिक्स में बीए (ऑनर्स) किया। इसके अलावा, दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस लॉ सेंटर से एलएलबी की डिग्री हासिल की। उन्हें 3 फरवरी 2014 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में एडिशनल जज नियुक्त किया गया और 1 फरवरी 2016 को वे परमानेंट जज बने। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में ट्रांसफर होने से पहले उन्होंने 20 जुलाई 2025 तक वहां अपनी सेवाएं दीं।
--आईएएनएस
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