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जयपुर हादसा : पानी से भरे अंडरपास में उलटी कार से मिले सात शव

भीलवाड़ा जिले के फुलिया कलां गांव से निकला यह काफ़िला हरिद्वार तक गया था — अपने बड़े-बुजुर्ग की अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने। रामराज अपनी पत्नी मधु, बेटे रुद्र और चाचा ससुर अशोक के परिवार को लेकर टैक्सी कार से निकले थे।
तीये की बैठक के बाद सफर शुरू हुआ था। एक पवित्र कर्तव्य निभाकर वे घर लौट रहे थे। रास्ते में कई बार रिश्तेदारों से बातचीत भी हुई। रात गहराने तक सब ठीक था — आख़िरी बार करीब 11 बजे फोन पर बात हुई, जब रामराज ने हँसते हुए कहा था — “दिल्ली में हूँ, सुबह तक घर पहुँच जाएंगे।”
किसे पता था, यह उनके जीवन का अंतिम संवाद होगा।
1200 किलोमीटर का सफर, और मौत की आखिरी 20 फीट
दो दिन में 1200 किमी का सफर पूरा कर चुके थे। सब थके थे। शायद ड्राइवर रामराज की आँखें बोझिल हो गईं, झपकी ने स्टेयरिंग संभालती उंगलियों को ढीला कर दिया। कार स्पीड में थी। डिवाइडर से टकराई और देखते ही देखते अंडरपास में जा गिरी।उसी अंडरपास में, जहाँ रात की खामोशी और पानी का सन्नाटा मौत का जाल बिछाए बैठा था।
सुबह का दिल दहला देने वाला नज़ारा
रविवार सुबह करीब साढ़े नौ बजे किसी राहगीर की नज़र उस उलटी पड़ी कार पर पड़ी। पानी से आधी डूबी गाड़ी को देखकर किसी ने नहीं सोचा था कि उसके भीतर सात लाशें कैद होंगी। दोपहर होते-होते एक ग्रामीण साहस कर कार तक पहुँचा। पानी के भीतर झाँकते ही उसके होश उड़ गए — अंदर शव पड़े थे।
चीख-पुकार मच गई। ग्रामीण दौड़कर बाहर आए। पुलिस को खबर दी गई।
शिवदासपुरा थाना पुलिस पहुंची। लेकिन कार ऐसी उलझी थी कि किसी का बाहर निकलना मुमकिन नहीं था। क्रेन मंगवाई गई। धीरे-धीरे कार को सीधा किया गया।जब क्रेन की पकड़ में आई वह गाड़ी बाहर निकली, तो उसके भीतर से मौत का मंजर छलक पड़ा। टूटे शीशों से, क्षत-विक्षत बॉडी से, और पानी से लिपटे शवों से जैसे हादसे की पूरी दास्तान खुद ब खुद बयान हो रही थी।
घर वालों का इंतजार और अचानक टूटी खबर
घर पर इंतजार हो रहा था। शनिवार रात से ही परिजनों के फोन नहीं लग रहे थे। सब मान बैठे थे कि शायद वे पुष्कर होकर लौट रहे होंगे। किसी को अंदाज़ा तक नहीं था कि वे अब लौटेंगे भी नहीं।रविवार दोपहर पुलिस ने फोन किया — “मॉर्च्युरी आइए।”जब महात्मा गांधी हॉस्पिटल की ठंडी दीवारों के बीच परिवार ने अपने अपनों के शव पहचाने... उस पल रोने की आवाज़ें दीवारों से टकराकर गूँज उठीं।
एक अधूरी यात्रा
यह सफर अस्थियों के विसर्जन से शुरू हुआ था, पर लौटते वक्त सात नई अस्थियाँ घर ले आया।मौत कभी दस्तक नहीं देती, वह अचानक दरवाज़ा तोड़कर आती है। उस रात भी वही हुआ। एक झपकी, एक टक्कर, और सब कुछ हमेशा के लिए खत्म हो गया।
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