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वंदे मातरम पर विवाद के बजाय एकता और भाईचारे पर ध्यान देना चाहिए: मौलाना शहाबुद्दीन रजवी

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जो लोग किसी वजह से वंदे मातरम नहीं पढ़ना चाहते, उन पर किसी तरह का दबाव डालना गलत है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी मान्यता, अपनी सुविधा और अपने विवेक के मुताबिक फैसला लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी को यह कहना कि तुम्हें हर हाल में यह गीत करना ही है, यह बात ठीक नहीं है।
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला भी दिया जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के निर्णय के बाद साफ कहा गया था कि किसी भी छात्र या नागरिक पर वंदे मातरम पढ़ने का दबाव नहीं बनाया जा सकता। अदालतें हमेशा व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करती हैं और यही बात आज भी लागू होती है।
उनका कहना है कि लोगों को उनके विवेक पर छोड़ देना ही बेहतर है। जो लोग इस गीत को पसंद करते हैं, वे शौक से पढ़ें। यह बिल्कुल स्वागतयोग्य है, लेकिन जो नहीं पढ़ना चाहते, उनको मजबूर करना न संविधान के हिसाब से सही है, न समाज के।
--आईएएनएस
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