भारतीय पत्रकारिता को कलंकित करता गोदी मीडिया

प्रदर्शनकारियों ने "ये पत्रकारिता नहीं, सत्ता की दलाली है" जैसे नारे लगाये। गोदी मीडिया का पुतला फूंका गया। इसके बाद यह सवाल भी खड़ा हुआ कि निजी टी वी चैनल तो भय लालच व्यवसायिकता अथवा वैचारिक कारणों से तो सत्ता की गोद में जाकर बैठ ही चुके हैं परन्तु आख़िर देश के कर दाताओं के पैसों से चलने वाला सरकारी चैनल भी क्या अपनी निष्पक्षता खो चुका है ? क्या DD News पर भी करोड़ों रूपये लेने वाले पत्रकार व टाई सूट में सजे धजे टी वी ऐंकर भी अब आई टी सेल या ट्रोलर्स की भाषा बोलने के लिये मजबूर हो चुके हैं?
इसी तरह एक निजी टीवी चैनल की एक एंकर हैं जिन्होंने पिछले दिनों इफ़्तार पार्टी आयोजित कर कई राजनेताओं को दावत दी थी। उनकी यह दावत और आमंत्रित लोगों को देखकर यह समझने में देर नहीं लगी कि उनका राजनैतिक रुझान भी है और वह पत्रकारिता के बाद संभवतः राजनीति में ही अपना कैरियर बना सकती हैं। दरअसल गोदी पत्रकारों को यह मालूम है कि 'गोदी ' से उतरने के बाद वे इस लायक़ ही नहीं रहेंगे कि अपना कोई प्लेटफ़ॉर्म खड़ाकर उसपर अपने 'जौहर' दिखा सकें। क्योंकि हर पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन, रवीश कुमार, अजीत अंजुम, अभिसार शर्मा, अशोक पाण्डेय, पुण्य प्रसून वाजपेई, प्रज्ञा मिश्रा, आरिफ़ा ख़ानम या आशुतोष जैसे पत्रकारों के नक़्शे क़दम पर नहीं चल सकता।
दरअसल ऐसी पत्रकारिता के लिये अध्ययन, साहस, ज्ञान, पत्रकारिता का दायित्वबोध आदि सब कुछ चाहिये जो चाटुकारिता या सत्ता की दलाली के लिये ज़रूरी नहीं। बहरहाल गोदी चैनल की यही मोहतरमा अपने चैनल पर एक पाकिस्तानी मेहमान को बार बार बुलाती हैं। यह जब उससे कोई तीखा सवाल जानबूझकर करती हैं तो वह शख़्स इनसे भी तीखा जवाब देता है। मैंने उसे अपशब्द बोलते, गलियां निकालते भी सुना यहाँ तक कि उसकी कई टिप्पणियों से हमारे देश की तौहीन भी हुई। परन्तु यह आज भी उसे जानबूझकर बार बार बुलाती हैं।
अब तो उस पाकिस्तानी व्यक्ति की लोकप्रियता गोदी चैनल्स में इतनी बढ़ गयी है कि वह व्यक्ति दूसरे चैनल्स पर भी नज़र आने लगा है। वह ख़ुद भी कह चुका है कि तुम हिंदुस्तानी चैनल वाले मुझे बुलाते ही इसलिये हो ताकि तुम्हारी टी आर पी बढ़े। सनसनी फैलाने, पक्षपात करने, सत्ता का गुणगान करने, भ्रामक रिपोर्टिंग करने, बहस में अपना एजेंडा थोपने, साम्प्रदायिकता फैलाने सत्ता के बजाय विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने, मंहगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर बहस न करने व इन मूल मुद्दों को न उठाने जैसी अपनी ग़ैर ज़िम्मेदाराना हरकतों के चलते आज विदेशों में भी भारतीय मीडिया की छवि नकारात्मक बन चुकी है।
इसीलिये भारतीय मीडिया को अक्सर सरकार का चमचा या " गोदी मीडिया " कहकर संबोधित करते हैं। पूर्व में हुये भारत-पाकिस्तान संघर्ष हों या वर्तमान में छिड़ा पश्चिम एशिया संघर्ष। गोदी मीडिया पर कई बार अपुष्ट व मनगढ़ंत ख़बरें चलाने के आरोप लग चुके हैं। कुछ देशों में भारतीय मीडिया को तो महज़ सत्ता के एजेंडे के प्रसार का माध्यम मात्र माना जाता है। आज इसी गोदी मीडिया ने सनसनीखेज़ झूठी व भ्रामक ख़बरें फैलाकर देश में बड़ा सामाजिक विभाजन पैदा कर दिया है।
और मज़े की बात तो यह है कि सत्ता की चाटुकारिता व उसके एजेंडों को परोसने गोया इन्हीं हथकंडों के इस्तेमाल से जो जो मीडिया सत्ता की छवि गढ़ने की फ़िक्र में सत्ता के सामने शाष्टांग दंडवत होने में कोई कसर नहीं छोड़ता वही मीडिया यह भूल जाता है कि उसके इस प्रयोग के चलते देश और दुनिया में ख़ुद भारतीय मीडिया की स्थिति क्या होती जा रही है? अनेक बार भारतीय अदालतें ऐसे मीडिया घरानों को डांट फटकार चुकी हैं।
कई बार मीडिया पर नज़र रखने वाली सर्वोच्च संस्था एनबीएसए इनकी विवादित प्रस्तुतियों की आलोचना कर चुकी है व इन्हें निर्देशित कर चुकी है। कई बार इन्हें सज़ा भी हो चुकी है। कई बार चैनल पर मुआफ़ी भी मांग चुके हैं। कई बार यह अपने झूठे व भ्रामक ट्वीट भी डिलीट कर चुके हैं। इनके द्वारा फैलाई जाने वाली अफ़वाहों का कई बार पुलिस भी खंडन कर चुकी है। परन्तु इन सब के बावजूद गोदी मीडिया का भारतीय पत्रकारिता को कलंकित करने का अफ़सोसनाक खेल बदस्तूर जारी है।
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