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फ़र्ज़ी मुठभेड़ : सुलगते सवाल

परन्तु पिछले दिनों बिहार के भोजपुर ज़िले के बिलौटी गांव में 28 वर्षीय भरत भूषण उर्फ़ भरत तिवारी के साथ हुई कथित पुलिस मुठभेड़ ने तो न केवल बिहार पुलिस की इस अवैध कार्रवाई बल्कि सत्ता व शासन प्रशासन के समक्ष भी बड़े सवाल खड़े कर दिये हैं। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा बिहार पुलिस के समर्थन व उसकी हौसला अफ़ज़ाई में दिये उस बयान के संदर्भ में भी देखा जा रहा है जिसमें उन्होंने पुलिस को अपराधियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने के लिए पूरी छूट या फ़्री हैंड देने और राज्य में अपराधियों से कोई समझौता नहीं करने जैसी बात कही थी।
परन्तु सूत्रों के अनुसार मुठभेड़ के शिकार भरत तिवारी के विरुद्ध इस घटना से पहले किसी तरह के अपराध का कोई मामला दर्ज नहीं है। हाँ उसका इतना अपराध ज़रूर था कि उसने सरकार,प्रशासन व जनप्रतिनिधियों से अपने क्षेत्र के बाढ़ कटाव-पीड़ितों के पुनर्वास और उनके लिये रहने लायक़ व्यवस्था की मांग कर रहा था। वह अपने बिलौटी गांव में आवंटित ज़मीन को रहने योग्य बनाने के लिए वहां 8–10 फ़ीट तक मिट्टी भरवाने की बात कर रहा था। उसकी मांगें प्रायः वही थीं जिन्हें पूरा करने का जनप्रतिनिधियों ने चुनाव पूर्व वादा किया था। उसका कहना था कि नेताओं व अधिकारियों को अपने वादे पूरे करने चाहिए।
पुलिस मुठभेड़ से पहले उसके द्वारा बनायी गयी वीडिओ में जोकि बाद में बहुत वायरल हुई,वह यह कहते सुना गया कि “आज के बाद कोई भी नेता झूठा वादा नहीं करेगा,वादा करेगा तो उसे पूरा करना होगा”। यह वीडियो उसने अपने हाथों में रिवाल्वर लेकर बनाई थी इसमें वह शर्त रखता है कि मांगें पूरी होंगी तो वह हथियार डाल देगा, और बाद में उसने पुलिस कर्मियों के सामने अपनी पिस्तौल ज़मीन पर फेंकते हुए यह चेतावनी भी दी कि अगर उसके साथ फिर छल हुआ तो वह उसका जवाब देगा।
ख़बर यह भी है कि चूँकि उसे फ़र्ज़ी मुठभेड़ में अपनी हत्या किये जाने का शक था इसीलिये एक अन्य वीडिओ में उसने अपने शरीर को भारतीय सेना को दान करने की बात भी कही थी। बहरहाल,इस मुठभेड़ को ग़लत,ग़ैरज़रूरी व फ़र्ज़ी साबित करने की जो दलीलें हैं उनमें सबसे बड़ी बात तो यही है कि उसने अपनी पिस्तौल पुलिस के समक्ष फेंक दी थी और पुलिस ने पिस्तौल अपने नियंत्रण में ले लिया था उसके बाद 'मुठभेड़ ' कैसी ? दूसरी बात यह कि जब पुलिस स्वयं उसे पागल व मानसिक रूप से विक्षिप्त बता चुकी थी फिर ऐसे 'मानसिक रोगी ' को कथित पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की ज़रुरत क्यों पड़ी।
तिवारी के परिवार और स्थानीय लोगों ने भी पुलिस कार्रवाई पर यही कहते हुये सवाल उठाये हैं कि - 'जब उसने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया था या हथियार छोड़ दिए थे, फिर पुलिस की तरफ़ से गोली क्यों चलाई गयी? और सबसे बड़ा सवाल जो सत्ता,शासन और प्रशासन को सीधे कटघरे में खड़ा करता है वह यह कि क्या नेताओं को उनके किये गये चुनावी वादे याद दिलाना, बाढ़ जैसी समस्या से त्राहि त्राहि कर रही जनता की आवाज़ बुलंद करना,भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाना क्या यह सब इतना बड़ा अपराध है कि आवाज़ उठाने वाले की सरकारी तंत्र द्वारा पुलिस मुठभेड़ बताकर हत्या कर दी जाये ?
भरत तिवारी का हाथों में पिस्तौल लहराते हुये अपनी बात कहना व पुलिस को चुनौती देना निश्चित रूप से ग़ैरक़ानूनी था। परन्तु शस्त्र फेंकने के बावजूद पुलिस मुठभेड़ के नाम पर उसकी पुलिसिया हत्या कर देना तो उससे भी बड़ा अपराध है ? जाति के लिहाज़ से चूँकि भरत तिवारी ब्राह्मण जाति से था इसलिये कुछ वरिष्ठ ब्रह्मण भाजपा नेता ही इस फ़र्ज़ी मुठभेड़ से रुष्ट होकर इस हत्या को 'ब्रह्म हत्या ' की संज्ञा दे रहे हैं।
परन्तु इस तरह की बातें करना मामले की गंभीरता को कम करने के सिवा कुछ भी नहीं। क्योंकि भरत ने समग्र गांव के समग्र समाज की कठिनाइयों व उनके सामने आने वाली रोज़मर्रा की दिक़्क़तों को उजागर करते हुये सत्ता व व्यवस्था के सामने सवाल रखे थे न कि अपनी जाति विशेष के लिये वह कुछ मांग रहा था ? बहरहाल ताज़ा ख़बरों के अनुसार इस फ़र्ज़ी एनकाउंटर में शामिल पुलिसवालों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गयी है। इस में कार्रवाई के दौरान मौके पर मौजूद पुलिसवालों की भूमिका की जांच की जाएगी। टीम घटना से जुड़े प्राप्त सबूतों, वीडियो रिकॉर्डिंग, चश्मदीदों के बयानों और दूसरे दस्तावेज़ों की जांच करेगी ताकि घटना की वास्तविकता का पता लगाया जा सके।
भरत तिवारी की मौत के बाद सोशल मीडिया और स्थानीय समाज में कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी। परिवार वालों का मानना है कि एनकाउंटर संदिग्ध हालात में हुआ, जबकि पुलिस दावा करती रही है कि कार्रवाई क़ानून के मुताबिक़ की गई थी। इस विवाद के कारण यह मामला राजनीतिक बहस का विषय भी बन गया था। इसलिये निश्चित रूप से भोजपुर “फ़र्ज़ी मुठभेड़” अपने आप में कई सुलगते सवाल छोड़ गयी है जिसका जवाब सत्ता और व्यवस्था को देना ही पड़ेगा।
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