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आरक्षण में क्रीमी लेयर की बात करना सामाजिक न्याय और संविधान की मूल भावना के खिलाफ : मायावती

उन्होंने लिखा कि इस बारे में आरएसएस प्रमुख का हाल में फिर से यह कहना कि 'आरक्षण का जानबूझकर राजनीतिकरण किया गया है, जिससे समाज में कड़वाहट भरी है और आरक्षण के लाभार्तियों को स्वेच्छा से इसका लाभ छोड़ देना चाहिए', वास्तव में यह इनकी ऐसी जातिवादी सोच है जिससे संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति तो हो सकती है, किंतु इससे संवैधानिक उद्देश्यों की अवहेलना होती है, क्योंकि आरक्षण मूलतः सदियों से जातिवादी व्यवस्था के शिकार करोड़ों शोषित-पीड़ित, उपेक्षित व तिरस्कृत लोगों को मानवीय आधार पर समता व समानता का संवैधानिक व कानूनी अधिकार देना है, जिसे आर्थिक उन्नति से कतई भी नहीं आंका जा सकता है।"
मायावती ने कहा कि जातिवाद का दंश जीवन के हर पहलू में उन्हें डसता ही रहता है और जो क्रम अभी भी हर स्तर पर लगातार जारी है, यह आरएसएस से अधिक भला कौन जानता है?
बसपा सुप्रीमो ने कहा कि इतना ही नहीं, बल्कि केंद्र में अभी तक रही सभी सरकारें भी इस कड़वी जमीनी वास्तविकता को भलीभांति जानती और समझती भी हैं। इसीलिए अगर वर्तमान सरकार अपने वाजिब तर्कों के आधार पर इसकी प्रभावी व समुचित पैरवी करके एससी व एसटी समाज को क्रीमी लेयर से दूर रखने के लिए अपना पक्ष अदालत से मनवा लेती है तो यह पूरी तरह से उचित व संवैधानिक होगा।
मायावती ने लिखा, "अक्सर यही देखा गया है कि सरकारों के लचर रवैये व अच्छी कानूनी पैरवी के अभाव में ही अदालतें 'सामाजिक परिवर्तन' आदि के मामलों में सही से न्याय नहीं कर पाती हैं। इस बारे में आरएसएस से भी यही कहना है कि वह बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के मानवतावादी और कल्याणकारी संविधान को पूरा-पूरा आदर-सम्मान देते हुए आरक्षण को लेकर राजनीति करना छोड़ दे।"
साथ ही, बसपा सुप्रीमो ने कहा कि आरक्षण में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की वकालत बंद करके देश में 'समतामूलक समाज व्यवस्था' की स्थापना के संवैधानिक दायित्व/उद्देश्यों की पूर्ति में पूरी तरह से सहयोग करे तो यह बेहतर होगा, यही वक्त की जरूरत व समय की मांग भी है।
--आईएएनएस
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