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ज़मीन आसमान का अंतर: खबरदार, वह अमेरिका है भारत नहीं

khaskhabar.com: बुधवार, 10 दिसम्बर 2025 12:58 PM (IST)
ज़मीन आसमान का अंतर: खबरदार, वह अमेरिका है भारत नहीं
मेरिका अमूमन हर भारतीय का वह सपनीला देश है जहां वह रहना चाहता है, नौकरी करना चाहता है। बसना चाहता है और फिर वापस लौटना नहीं चाहता। लेकिन अधिकांश भारतीयों में वहां रहने योग्य योग्यताएं नहीं। क्योंकि किसी भी रूप में उनकी जीवन-शैली वहां के योग्य नहीं। चूंकि यहां हम सड़क पर ही लघुशंका और शौच करने से नहीं चूकते। चलते-चलते सड़क पर ही नाक साफ कर लेते हैं। सड़क पर ही थूक भी देते हैं। सड़क पर ही सड़क छाप गालियां भी बक देते हैं। अच्छे-खासे पढ़े-लिखे होने का दावा करने के बावजूद लफंगा गिरी करने से भी नहीं चूकते। ट्रेफिक रूल्स को हम फ़ॉलो नहीं करते। इस देश की सभी सड़कें कांजी हाउस बनी हुई हैं फिर भी इन्सान उन पर चलने को मजबूर है। क्योंकि यहां व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। यहां तक कि भ्रष्टाचार के बिना यहां कोई जी नहीं रहा। कुल मिलाकर हममें ऐसी कोई भी क़्वालिटी नहीं है कि अमेरिका जैसा एक बेहतरीन देश हमें स्थान दे। जिस तरह की दुनियां, आदतों और आबो-हवा के हम आदी हैं, ऐसे में हम यहां रह सकते हैं, वहां नहीं। जो कुछ सुरेश काकू ने अपनी पुस्तक दूर गगन तले में लिखा वहां के और यहां के लोगों में हर दृष्टि से ज़मीन-आसमान का अंतर है। दो टूक कि वहां के लोगों के समक्ष यहां के लोग गंवार हैं। सुरेश काकू ने वहां जो कुछ देखा एक जर्नलिस्ट की नज़र से देखा, बारीकी से देखा और उन्हें भी कोफ्त हुई कि भारत में ज्ञान की सिर्फ बातें हैं। ज्ञान योग्य आचरण नहीं। जबकि अमेरिका में ज्ञान और अपने देश के प्रति भरपूर समर्पण भाव है। जबकि यहां की राजनीति तक में अपने देश को लेकर कोई सार्थक सोच नहीं। सिर्फ फ़िज़ूल की बातें और अपने-अपने स्वार्थ हैं। यहां खंडहर हो चुके कल की राजनीति में ही नेता लोग मश्गूल रहते हैं। भविष्य का विस्तार ज्ञान उनमें है ही नहीं। दूर गगन तले, अमेरिका से लंदन अपनी इस पुस्तक में उन्होंने बहुत-कुछ लिख दिया और अमेरिका का बहुत-कुछ दिखा दिया।
एक खास बात जो कि सुरेश काकू भाई ने अपनी पुस्तक में नहीं लिखी कि भारत में मंदिरों में किसी भी स्त्री के आ जाने पर वहां उपस्थित सभी की निगाहें ईश्वर की मूर्ति से हट कर उस स्त्री पर आकर ठहर जाती हैं। जबकि अमेरिका में ऐसा नहीं होता। वहां मंदिर में प्रवेश करते समय कोई भी इधर-उधर नहीं देखते। मंदिर में मर्यादित कपड़े पहनना आवश्यक है। यह हम भारतीयों का सबसे बड़ा माइनस प्वाइंट है। उन्होंने लिखा कि वहां भी घर से बाहर जाते समय ताला लगाते हैं। लेकिन अगर किसी ने आपके ताले को हाथ भी लगाया तो सायरन बजने के साथ आपके मोबाइल पर घंटी आ जाएगी।
अगर तीन घंटी में आपने मोबाइल रिसीव नहीं किया तो घंटी सम्बंधित पुलिस स्टेशन पर बजती है जिससे तुंरत पुलिस वहां पहुंच जाती है। जबकि भारत में पुलिस सब-कुछ हो जाने के बाद पहुंचती है। सफाई का पूरा ध्यान जनता खुद रखती है। सरकार ने जगह-जगह ऐसे बोर्ड लगा रखे हैं। मुझे आश्चर्य तब हुआ जब मैंने वहां लगे सफाई के बोर्ड को देखा लिखा था कुत्ता लेट्रीन करेगा, जगह साफ करें। सुबह शाम आदमी अपने कुते को घुमाने ले जाते हैं। सड़क किनारे कुत्ता लेट्रिन कर दे तो मालिक को ही साफ करना होता है। वह थैले में डाल कर उसे यथा स्थान ले जाता है तथा उस स्थान को धो कर साफ करता है। जबकि भारत में हम ऐसा कहीं नहीं करते। पार्किंग हर माल या हर स्टोर की अपनी पार्किंग है।
आगंतुक अपनी गाड़ी निर्धारित लाइन में ही खड़ी करते हैं। एक गाड़ी और दूसरी गाड़ी के बीच पांच फुट का गैप रहता है ताकि दोनों को गेट खोलने में परेशानी न हो। जबकि भारत मे अनाड़ियों की तरह खड़ी कर देते हैं। पार्किंग से लेकर सभी जगह अपाहिजों को प्राथमिकता दी जाती है। पार्किंग स्थल पर भी निशान लगे रहते हैं। पूरी पार्किंग फुल होने के बाद भी आप विकंलाग की पार्किंग में अपनी गाड़ी नहीं लगा सकते। अगर आपने गाड़ी विकंलाग की जगह खड़ी की और किसी ने नोटिस किया तो आपको हाथों हाथ तीन सौ डालर का जुर्माना देना पड़ सकता है।
समय, पैसा व जमीन का सदुपयोग वहां श्रमिकों की कमी है। इसलिए सरकार ने बसों में जो ड्राइवर रखें है वे कन्डेक्टर से ज्यादा का काम करने हैं। निर्धारित स्थान पर बस को रोकने के साथ ड्राइवर जहां दरवाजे खोलता है वहीं गेट पर आगंतुकों का लगैज बस में रखते हैं। यह उनकी ड्यूटी में शामिल हैं। सरकार बंजर भूमि के उपयोग के लिए वहां सोलर और पवन चक्की लगाकर बिजली उत्पादन करती है। पेड़ काटना मना है। अगर किसी को पेड़ से परेशानी है तो जमीन से सात आठ फुट तक पेड़ की टहनी को काट दिया जाता है। जबकि भारत में हाल ही अडानी के लिए लाखों पेड़ काट दिए गए। ईमानदारी की मिसाल अमेरिका में अस्पताल से लेकर स्टोर व होटलों में ईमानदारी बरती जाती है।
ग्राहक द्वारा माल खरीदने के बाद भी तय समय में अगर पसंद न आए तो माल वापिस करके तुरंत पैसे वापसी व्यवस्था है। ग्राहक को गुमराह नहीं किया जाता। जो है सामने है, ग़लत प्रचार प्रसार नहीं किया जाता। वस्तु पर जो लिखा होता है उस पर विश्वास होता है, ग़लत पाए जाने पर पुलिस तुरंत व सख़्त सजा देती है। बहुत कम मामलों में अदालत जाना होता है। होटलों इत्यादि में अवधि पार (एक्सपाइरी) सामान को रोड पर रख दिया जाता है। बावजूद एक्सपाइरी सामान पाए जाने पर बिना किसी सुनवाई के लाइसेंस रद्द कर दिए जाते हैं। बचा हुआ खाना साथ ले जाते हैं वहां सभी लोग रेस्टोरेंट में खाने के बाद बचा हुआ खाना अपने साथ ले जाते हैं।
खाना बचने पर होटल वाले आपको अच्छी क्वालटी के डिब्बे देते हैं जिसमें आप अपना बचा हुआ खाना साथ ले जा सकें। कई स्थानों पर आदमी खाना खाने के बाद दुगना पेमेंट करते हैं। बचे हुए पेमेंट से होटल वाले वहां जरूरतमंदों को निशुल्क खाना देते हैं। जरूरत मंद अमेरिका में जरूरतमंद किसी भी व्यक्ति या पर्यटक के पीछे नहीं पड़ते। जरूरतमंद व्यक्ति अपने हाथ में बोर्ड टाइप का बैनर लेकर सड़क के किनारे खड़े रहते हैं। जहां व्यक्ति अपनी श्रद्दा के अनुसार उसे मदद करते हैं।

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