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समीक्षा विश्वनाथ एंड संस: मजबूत कथानक को कमजोर पटकथा और लंबाई का नहीं मिला पूरा साथ

कहानी में संभावनाएं बहुत हैं
‘विश्वनाथ एंड संस’ का मूल विचार दिलचस्प है। उम्र, स्वभाव और जीवन के अनुभवों में अंतर रखने वाले संजू और मैडी के बीच विकसित होता रिश्ता सामान्य प्रेम कहानी से अलग आधार रखता है। मैडी का अपनी शिक्षा के लिए गर्भधारण करने का फैसला और बाद में अपने जन्म दिए बच्चे से दोबारा सामना होना कहानी को एक गंभीर भावनात्मक आधार देता है।
यहीं फिल्म की सबसे बड़ी संभावना भी छिपी है। मैडी के फैसलों के पीछे की मनःस्थिति, बच्चे से दोबारा मिलने पर उसका भावनात्मक संघर्ष और संजू के प्रति उसके आकर्षण को अगर थोड़ा और विस्तार मिलता तो कहानी कहीं अधिक प्रभावशाली हो सकती थी। फिल्म इन सवालों को उठाती जरूर है, लेकिन उनके साथ ज्यादा देर ठहरती नहीं।
मैमिता और सूर्या का अच्छा अभिनय
मैमिता बैजू मैडी के किरदार में प्रभावी हैं। वह किरदार की सहजता और भीतर छिपी उलझन दोनों को संतुलित करने की कोशिश करती हैं। खास बात यह है कि कई दृश्यों में उनकी खामोशी संवाद से ज्यादा असर पैदा करती है। हालांकि पटकथा उन्हें पूरी तरह खोलने का अवसर नहीं देती, फिर भी उनका अभिनय फिल्म की मजबूत कड़ियों में शामिल है।
सूर्या भी संजू के किरदार में संयमित दिखाई देते हैं। उनका किरदार अपनी भावनाओं को आसानी से व्यक्त नहीं करता और अभिनेता इस पहलू को स्वाभाविक ढंग से निभाते हैं। खासकर अपनी माँ की मृत्यु के बाद संजू के भीतर दबा भावनात्मक पक्ष सामने आता है तो सूर्या का अभिनय असर छोड़ता है। उन दृश्यों में उनके चेहरे पर दिखाई देने वाली असुरक्षा और पीड़ा फिल्म को उसके बेहतर क्षण देती है।
माँ की भूमिका में राधिका भी अपने हिस्से में सहज हैं और मैमिता के साथ उनकी केमिस्ट्री फिल्म में पारिवारिक गर्माहट पैदा करती है।
प्रेम कहानी में गहराई की गुंजाइश
संजू और मैडी का रिश्ता फिल्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन दोनों के बीच पैदा होने वाले आकर्षण की मनोवैज्ञानिक वजहों को पर्याप्त जगह नहीं मिलती। संजू का उम्र के अंतर को लेकर झिझकना स्वाभाविक लगता है, लेकिन मैडी उसके प्रति इतनी आकर्षित क्यों होती है, इस सवाल का जवाब फिल्म बहुत स्पष्टता से नहीं देती।
यहां फिल्म कई संभावनाएं खोलती है। मैडी के जीवन में माता-पिता का अभाव, सुरक्षा की उसकी जरूरत और संजू में दिखाई देने वाली जिम्मेदारी—इन सभी को उसके आकर्षण से जोड़ा जा सकता था। लेकिन फिल्म इन भावनात्मक परतों को विस्तार देने के बजाय कहानी को आगे बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान देती है। इसलिए रिश्ता समझ में तो आता है, लेकिन उसकी गहराई पूरी तरह महसूस नहीं हो पाती।
मनोरंजन और गंभीरता के बीच संतुलन
परिवार आधारित व्यावसायिक फिल्म के तौर पर ‘विश्वनाथ एंड संस’ में हास्य और मनोरंजन का होना स्वाभाविक है। कुछ हल्के-फुल्के प्रसंग और संवाद फिल्म को भारी होने से बचाते हैं। हालांकि कुछ जगह हास्य परिस्थितियों से स्वाभाविक रूप से निकलने के बजाय पटकथा में जोड़ा हुआ लगता है।
यही बात लड़ाई वाले कुछ प्रसंगों पर भी लागू होती है। वे दर्शकों का मनोरंजन करने की कोशिश जरूर करते हैं, लेकिन कहानी के भावनात्मक प्रवाह के साथ उनका जुड़ाव हर जगह समान रूप से मजबूत नहीं है। अगर इन हिस्सों में थोड़ा संयम रखा जाता तो फिल्म का भावनात्मक पक्ष ज्यादा प्रभावी हो सकता था।
परिवार और रिश्तों की अच्छी परतें
फिल्म की एक बड़ी खूबी यह है कि इसमें परिवार के भीतर अनजाने में एक-दूसरे को चोट पहुंचाने का विचार लगातार दिखाई देता है। कई फैसले बुरी नीयत से नहीं लिए जाते, लेकिन उनका असर दूसरे व्यक्ति पर गहरा पड़ता है। संजू के पारिवारिक रिश्तों में भी ऐसी कई भावनात्मक परतें हैं, जिनमें फिल्म को तलाश करने के लिए अच्छा आधार मिलता है।
इन हिस्सों में फिल्म कई बार बहुत अच्छी लगती है। समस्या यह है कि वह एक ही भाव पर टिकने के बजाय कई दिशाओं में फैल जाती है। कुछ प्रसंग और रिश्ते कहानी को व्यापक तो बनाते हैं, लेकिन उसके केंद्रीय भाव को उतना मजबूत नहीं कर पाते।
लंबाई और पटकथा की समस्या
फिल्म की लंबाई का असर इसलिए भी महसूस होता है क्योंकि कुछ प्रसंग ऐसे हैं जिन्हें छोटा किया जा सकता था। उस समय का इस्तेमाल संजू और मैडी के रिश्ते या परिवार के भीतर के भावनात्मक संघर्ष को विकसित करने में किया जाता तो फिल्म अधिक संतुलित लगती।
पटकथा की एक और कमजोरी यह है कि कई बार फिल्म दर्शक को किसी भावना या संकेत का अर्थ खुद समझने देने के बजाय उसे संवाद और दृश्यों के माध्यम से दोबारा स्पष्ट करती है। जबकि कुछ भावनात्मक क्षण अपने आप में पर्याप्त थे। सिनेमा में हर बात को समझाना जरूरी नहीं होता; दर्शक पर थोड़ा भरोसा भी जरूरी है।
तकनीकी पक्ष
तकनीकी स्तर पर फिल्म अपने संसार को विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करती है। छायांकन में पारिवारिक माहौल और किरदारों की भावनाओं को सामने लाने की कोशिश दिखाई देती है। हालांकि कुछ दृश्यों में जरूरत से ज्यादा कोण और तेज कट उस स्वाभाविकता को कम कर देते हैं, जिसकी भावनात्मक दृश्यों को जरूरत होती है। संपादन कहानी को गति देता है, लेकिन कुछ जगह यही गति भावनात्मक ठहराव पर भारी पड़ती है। गीत-संगीत फिल्म के माहौल को सहारा देता है, हालांकि सभी गीत कहानी के साथ समान रूप से सहज नहीं बैठते। तकनीकी पक्ष को पूरी तरह कमजोर कहना उचित नहीं होगा, लेकिन पटकथा की सीमाओं के कारण इसका पूरा लाभ फिल्म को नहीं मिल पाता।
‘विश्वनाथ एंड संस’ को केवल कमजोर फिल्म कह देना उसके साथ न्याय नहीं होगा। इसमें मजबूत कथानक है, अच्छे कलाकार हैं और परिवार, प्रेम तथा रिश्तों को लेकर कई संवेदनशील विचार भी हैं। मैमिता बैजू और सूर्या का अभिनय कई दृश्यों में फिल्म को भावनात्मक आधार देता है और कुछ दृश्य वास्तव में असर छोड़ते हैं।
लेकिन फिल्म की समस्या उसकी संभावनाओं और उपलब्धि के बीच का अंतर है। जिस कहानी में गहराई से उतरकर एक यादगार पारिवारिक प्रेम कहानी कही जा सकती थी, पटकथा उसे कई दिशाओं में फैलाकर कुछ हद तक कमजोर कर देती है। लंबाई, कुछ अनावश्यक प्रसंग और भावनाओं को जरूरत से ज्यादा समझाने की प्रवृत्ति भी इसके असर को सीमित करती है।
‘विश्वनाथ एंड संस’ ऐसी फिल्म है जिसमें कहानी अच्छी है, कलाकार अच्छे हैं और भावनात्मक आधार भी मजबूत है, लेकिन पटकथा उन तीनों को उनकी पूरी क्षमता से जोड़ नहीं पाती। फिल्म देखने के बाद इसकी कमियां जरूर याद रहती हैं, लेकिन इसके कुछ अच्छे भावनात्मक क्षण और कलाकारों का काम भी आसानी से भुलाया नहीं जाता। यही इसकी सबसे बड़ी खूबी और सबसे बड़ी कमी—दोनों है।
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