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प्रकृति का वरदान है लामज्जक, जोड़ों के दर्द और त्वचा रोगों में देता है आराम

khaskhabar.com: मंगलवार, 01 सितम्बर 2026 11:54 AM (IST)
प्रकृति का वरदान है लामज्जक, जोड़ों के दर्द और त्वचा रोगों में देता है आराम
नई दिल्ली । हमारे आसपास कई ऐसे पौधे पाए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल सदियों से आयुर्वेद और लोक चिकित्सा में अलग-अलग तरह से किया जाता रहा है। लामज्जक भी ऐसा ही एक औषधीय पौधा है। इसे पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में बुखार, गठिया, शरीर के दर्द और त्वचा से जुड़ी कुछ समस्याओं के लिए उपयोगी माना गया है। आयुष मंत्रालय ने नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट एक्स पर पोस्ट कर बताया कि लामज्जक एक बहुवर्षीय जड़ी-बूटी है। इसका मतलब है कि यह एक बार उगने के बाद लंबे समय तक जीवित रह सकता है और अनुकूल परिस्थितियों में साल-दर-साल बढ़ता रहता है। आयुर्वेद और लोक चिकित्सा में लामज्जक का पारंपरिक उपयोग बुखार में किया जाता रहा है। इसे शरीर में बढ़ी गर्मी को संतुलित करने में सहायक माना जाता है। हालांकि, तेज या लगातार बुखार कई गंभीर बीमारियों का संकेत भी हो सकता है, इसलिए केवल किसी जड़ी-बूटी पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय जांच जरूरी है।
लामज्जक का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से गाउट (गठिया के एक प्रकार) और रूमेटिज्म जैसी स्थितियों में भी बताया जाता है। शरीर में दर्द या जोड़ों की तकलीफ के दौरान इसे लोक चिकित्सा में उपयोग किया जाता रहा है। लेकिन दर्द का कारण जानना जरूरी है, क्योंकि अलग-अलग समस्याओं का उपचार भी अलग होता है।
लोक चिकित्सा में लामज्जक का उपयोग विभिन्न त्वचा संबंधी स्थितियों में भी किया जाता है। हालांकि त्वचा पर किसी भी पौधे या उसके लेप का इस्तेमाल सीधे करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों में प्राकृतिक चीजें भी एलर्जी या जलन पैदा कर सकती हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार लामज्जक की रोपाई का समय जून से जुलाई के बीच बताया गया है। हालांकि मौसम, मिट्टी और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसमें बदलाव हो सकता है, इसलिए खेती के लिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर रहेगा।
बता दें कि लामज्जक घास कुल से संबंधित पौधा है। इसकी पहचान और सही उपयोग के लिए जानकार व्यक्ति या विशेषज्ञ की मदद लेना बेहतर होता है, क्योंकि औषधीय पौधों की सही पहचान बहुत जरूरी है।
--आईएएनएस

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