When cinema legend P. Jayaraj, who holds the record for a long film career, lost his lifes savings.-m.khaskhabar.com
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जब सिनेमा के महारथी पी. जयराज ने खो दी थी जीवनभर की जमा पूंजी, जिनके नाम दर्ज है लंबे फिल्मी करियर का रिकॉर्ड

khaskhabar.com: सोमवार, 10 अगस्त 2026 12:30 PM (IST)
जब सिनेमा के महारथी पी. जयराज ने खो दी थी जीवनभर की जमा पूंजी, जिनके नाम दर्ज है लंबे फिल्मी करियर का रिकॉर्ड
नई दिल्ली । यह दास्तां है भारतीय सिनेमा के उस कलाकार की, जिसने मूक फिल्मों के दौर से सिल्वर स्क्रीन पर कदम रखा और आगे जाकर सभी का चहेता बन गया। उनका यह जलवा आधुनिक सिनेमा के दौर में भी कायम रहा। बात हो रही है कि सुप्रिसिद्ध निर्माता-निर्देशक और अभिनेता पी. जयराज की। भारतीय सिनेमा का इतिहास जब भी एक सिरे से लिखा जाएगा, तो पहली फेहरिस्त में पी. जयराज का नाम शामिल होगा। 28 सितंबर 1909 को तेलंगाना के करीमनगर में जन्मे पी. जयराज जब निजाम कॉलेज में पढ़ाई लिखाई कर रहे थे, उसी समय वे अक्सर 'शेक्सपियर' के नाटकों का हिस्सा हुआ करते थे। परिवार काफी समृद्ध था। उनके मामा की शादी सरोजनी नायडू से हुई थी, जबकि पिता बहुत बड़े सरकारी औहदे पर थे।
उनके पड़ोसी पहले से फिल्म लाइन से जुड़े हुए थे और उनकी सलाह पर जयराज इस चकाचौंध भरी दुनिया की ओर निकल पड़े। जयराज वो अभिनेता थे, जिन्होंने दादा साहेब फाल्के के साथ मूक फिल्मों में काम की शुरुआत की थी। जयराज की दिलचस्पी फिल्म बनाने के हर आयाम की तरफ थी, चाहे वो कैमरा रहा या एडिटिंग। उन्होंने लगभग 11 साइलेंट फिल्मों में अभिनय किया।
शुरुआत में उन्होंने एक सहायक निर्देशक का काम किया। बतौर निर्देशक 'प्रतिभा' उनकी पहली फिल्म थी। फिल्मों में बतौर अभिनेता वर्ष 1929 की फिल्म 'जगमगाती जवानी' में पहला ब्रेक मिला था। बतौर नायक उनकी पहली फिल्म 'रसीली रानी' 1929 में ही प्रदर्शित हुई थी। 1932 में उनकी पहली बोलती फिल्म 'शिकारी' आई, जिसमें जयराज ने एक बौद्ध भिक्षु की भूमिका निभाई थी। इसमें सांप, बाघ और शेर जैसे हिंसक जानवरों के साथ लड़ाई के दृश्य फिल्माए गए थे।
अपने फिल्मी करियर में बतौर अभिनेता उन्होंने लगभग 300 फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें से 160 फिल्मों में नायक की भूमिका निभाई। कमाल की बात यह है कि वे तेलुगु भाषी रहे, लेकिन हिंदी, गुजराती और मराठी फिल्मों में काम किया। उन्होंने 'बादबान', 'हातिम ताई', 'परदेसी' और 'रजिया सुल्तान' जैसी कई प्रसिद्ध फिल्मों में अभिनय किया।
1950 और 60 के दशक में जयराज ने बड़े जबरदस्त किरदार निभाए। हिंदी सिनेमा के पर्दे पर सबसे अधिक राष्ट्रीय और ऐतिहासिक नायकों को जीवंत करने का कीर्तिमान जयराज के नाम ही है। अमर सिंह राठौर, पृथ्वीराज चौहान और महाराणा प्रताप जैसे दिग्गज किरदारों को निभाकर उन्होंने जीवंत किया। इन्हें शाहजहां और टीपू सुल्तान की भूमिका में भी खूब सराहा। इन्होंने चंद्रशेखर आजाद का भी किरदार निभाया था। पी. जयराज में एक खूबी और थी। ये दरअसल बहुत ही जबरदस्त घुड़सवार थे।
बतौर नायक उनकी आखिरी फिल्म 'खूनी कौन, मुजरिम कौन' 1965 में आई थी। इंडो रशियन फिल्म 'परदेसी' में भी उन्होंने अभिनय किया था।
एक निर्माता के रूप में उन्होंने साल 1951 में फिल्म 'सागर' का निर्माण किया, जो लॉर्ड टेनीसन की इनोच आर्डन पर आधारित कथा थी। हालांकि, इस फिल्म ने उन्हें बहुत बुरा झटका दिया। इसमें नरगिस और भारत भूषण थे। इस प्रोडक्शन में जयराज ने अपनी सारी जमा पूंजी खो दी। इस कारण उन्हें दोबारा अभिनय करना पड़ा और जो खोया था, उसे वापस पा लिया।
लंबे समय तक लगभग 70 साल तक फिल्मों में सक्रिय रहने के लिए 'गिनेज बुक' में उनका नाम दर्ज है। 1980 में पी. जयराज को सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहेब फाल्के से सम्मानित किया गया। 11 अगस्त 2000 को 91 साल की उम्र में इनका देहांत हो गया।

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