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सिद्धांत चतुर्वेदी ने यूपी की जड़ों और भोजपुरी के साथ भाषा से जुड़ी चुनौतियों पर की खुलकर बात

“बात यह नहीं है कि आप यूपी, बिहार, राजस्थान, गुजरात, नॉर्थ-ईस्ट या नेपाल से आते हैं, बात ये है कि भाषा की दीवार होती ही है। और जब आप किसी चीज़ को लेकर कॉन्शस हो जाते हैं, तो वह आपके आत्मविश्वास को प्रभावित करती है।” सिद्धांत ने कहा। गौरतलब है कि बेहद भावुकता के साथ कहे अपने दिल की बात को और भी मानवीय बना देती है सिद्धांत की ईमानदारी, जिसमें उन्होंने सीखने और खुद को ढालने की प्रक्रिया को बिना किसी दिखावे के स्वीकार किया।
उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने बिना किसी औपचारिक ट्रेनिंग के, जीवन के अनुभवों से बोलचाल सुधारी। यहां तक कि फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलनेवाली चेन्नई की लड़की के साथ पहली बार प्यार में पड़ना भी उनके लिए भावनात्मक ही नहीं, भाषाई सीख का भी हिस्सा था। हालांकि उनकी सच्ची और बिना बनावट की बातों ने ‘दो दीवाने शहर में’ में उनके किरदार को और गहराई दी है, जहां भावनात्मक संवेदनशीलता और सच्चाई कहानी का केंद्र है।
घर की भोजपुरी बातचीत से लेकर हिंदी सिनेमा में अपनी आवाज़ खोजने तक का सिद्धांत का सफर उन अनगिनत युवाओं की कहानी है, जो सपनों के साथ एक शहर से दूसरे शहर आते हैं। दिलचस्प बात ये है कि भाषा, पहचान और आत्मविश्वास पर बिना किसी चमक-दमक के बात करते हुए सिद्धांत चतुर्वेदी एक बार फिर साबित करते हैं कि दर्शक उनसे इसलिए जुड़ाव महसूस करते हैं क्योंकि वे खुद एक ऐसे कलाकार के रूप में उनसे जुड़ते हैं, जिनकी यात्रा बनावटी नहीं, बल्कि सच्ची, मेहनत से अर्जित की गई और गहराई से भारतीय है।
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