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"मेरे पास मां है", जावेद अख्तर ने अपनी कलम से लिखे इन फिल्मों के बेहतरीन डायलॉग

जावेद का मानना था कि कहानी, कलाकार, और संवाद एक साथ सांस लेते हैं। अगर तीनों में से किसी में भी कमी आ जाए तो किरदार मर जाता है। उन्होंने अमिताभ बच्चन की 'जंजीर', 'दीवार', 'त्रिशूल', और 'डॉन' में डायलॉग लिखे। फिल्म जंजीर में "जब तक बैठने को ना कहा जाए शराफत से खड़े रहो। ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं," फिल्म डॉन में "डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है," और फिल्म दीवार में "आज खुश तो बहुत होगे तुम!", "मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता," और "मेरे पास मां है।" ये आइकॉनिक डायलॉग अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के बीच फिल्माए गए और आज भी ये डायलॉग दर्शकों के बीच गूंजते हैं।
फिल्म शोले के गब्बर के आइकॉनिक डायलॉग भी सलीम और जावेद की जोड़ी ने ही लिखे। दोनों ने अपनी कलम से "कितने आदमी थे?" "ये हाथ हमको दे दे ठाकुर!", और "जो डर गया, समझो मर गया" जैसे सदाबहार डायलॉग लिखे। गब्बर को आइकॉनिक गब्बर बनाने से लेकर अमरीश पुरी को 'मोगैंबो' बनाने वाले भी वही थे। उन्होंने "मोगैंबो खुश हुआ!" और फिल्म त्रिशूल का अमिताभ बच्चन का डायलॉग "मेरे जख्म जल्दी नहीं भरते" भी लिखा।
--आईएएनएस
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