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गरीबी से शोहरत तक: हालातों से लड़कर कामयाबी की मिसाल बनीं मधुबाला

1942 में आई फिल्म 'बसंत' से उनके करियर को दिशा मिली। इसी फिल्म के बाद उनका नाम मुमताज से बदलकर मधुबाला रखा गया। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में काम किया और बहुत कम समय में अपनी पहचान बनाई। वह निर्माता की पहली पसंद बन गई और उनके पास फिल्मों के ऑफर आने लगे।
1950 का दशक मधुबाला के करियर का सुनहरा दौर माना जाता है। 'महल', 'तराना', 'हावड़ा ब्रिज', 'चलती का नाम गाड़ी',' और 'हाफ टिकट' जैसी फिल्मों ने उन्हें स्टार बना दिया। रोमांटिक हो या कॉमेडी, वह अपने हर एक किरदार को खूबसूरती के साथ निभाती थी। उस दौर में अभिनेत्रियों को सीमित भूमिकाएं मिलती थीं, लेकिन मधुबाला ने अपनी शर्तों पर काम किया और अपनी फीस भी खुद तय की।
मधुबाला की कामयाबी की सबसे बड़ी पहचान फिल्म 'मुगल-ए-आजम' बनी। यह फिल्म हिंदी सिनेमा की ऐतिहासिक फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान वह गंभीर दिल की बीमारी से जूझ रही थीं, इसके बावजूद उन्होंने शूट पूरे किए। कई बार सेट पर उनकी तबीयत बिगड़ जाती थी, लेकिन उन्होंने कभी अपने काम को बीच में नहीं छोड़ा।
कामयाबी के शिखर पर पहुंचने के बावजूद मधुबाला की जिंदगी आसान नहीं थी। बीमारी ने धीरे-धीरे उनके करियर को सीमित कर दिया, लेकिन उन्होंने कभी अपनी कमजोरी को आड़े नहीं आने दिया। 23 फरवरी 1969 को महज 36 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
आज भी मधुबाला को हिंदी सिनेमा की उन अभिनेत्रियों में गिना जाता है, जिन्होंने हालातों से लड़कर अपनी पहचान बनाई।
--आईएएनएस
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