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सिंधी समाज आज मना रहा तीजड़ी पर्व, सुहाग और वैवाहिक सुख की कामना से रखा जाता है व्रत

khaskhabar.com: सोमवार, 31 अगस्त 2026 09:00 AM (IST)
सिंधी समाज आज मना रहा तीजड़ी पर्व, सुहाग और वैवाहिक सुख की कामना से रखा जाता है व्रत
सिंधी समाज का प्रमुख पारंपरिक पर्व तीजड़ी आज, 31 अगस्त को श्रद्धा और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि से जुड़ा है और सिंधी परिवारों में इसका विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। सिंधी समाज के कैलेंडर में भी इस वर्ष तीजड़ी पर्व 31 अगस्त को दर्ज है। पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य की कामना से रखा जाता है व्रत
तीजड़ी के अवसर पर विवाहित महिलाएं अपने पति के अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं। परंपरागत रूप से कई परिवारों में यह व्रत पूरे दिन रखा जाता है और कुछ महिलाएं निर्जल व्रत का भी पालन करती हैं। वहीं, जिन युवतियों का विवाह नहीं हुआ है, वे भी इस पर्व पर व्रत रखती हैं। उनके लिए यह व्रत सुखी वैवाहिक जीवन और योग्य जीवनसाथी की कामना से जुड़ा माना जाता है।
तीजड़ी की परंपरा में महिलाओं की भागीदारी प्रमुख रहती है। पर्व के दौरान मेहंदी लगाने, पारंपरिक रूप से सजने-संवरने और सामूहिक रूप से पर्व मनाने की परंपरा कई सिंधी परिवारों में आज भी दिखाई देती है। पुराने समय से तीजड़ी को महिलाओं के धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने वाले पर्व के रूप में भी मनाया जाता रहा है।
तीजड़ी माता की पूजा और कथा का महत्व
तीजड़ी पर्व से जुड़ी परंपराओं में तीजड़ी माता की पूजा और कथा का विशेष स्थान है। कई स्थानों पर महिलाएं शाम के समय पूजा-अर्चना करती हैं और तीजड़ी माता की कथा सुनती हैं। कुछ सिंधी समुदायों में पूजा के लिए विशेष स्थान या मंदिर में सामूहिक आयोजन भी किए जाते हैं। वाराणसी में सिंधी परिवारों में तीजड़ी के अवसर पर तीजड़ी माता की पूजा, कथा और दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
पर्व की तैयारियों में मेहंदी का भी विशेष स्थान है। तीजड़ी से पहले महिलाएं और युवतियां हाथों पर मेहंदी लगाती हैं। यह परंपरा पर्व की धार्मिक भावना के साथ उसके सांस्कृतिक और पारिवारिक स्वरूप को भी सामने लाती है। सिंधी समाज के अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा तथा व्रत से जुड़ी कुछ परंपराओं में स्थानीय स्तर पर अंतर भी देखने को मिलता है।
चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा
तीजड़ी व्रत से जुड़ी एक प्रमुख परंपरा रात में चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलने की है। व्रत रखने वाली महिलाएं चंद्रमा के उदय की प्रतीक्षा करती हैं और उसके दर्शन के बाद पूजा-अर्चना कर अर्घ्य देती हैं। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है। इस परंपरा का उल्लेख सिंधी समाज से संबंधित विभिन्न स्रोतों और पूर्व में प्रकाशित स्थानीय समाचारों में भी मिलता है।
कुछ परंपराओं में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलने की प्रक्रिया में परिवार के सदस्य भी शामिल होते हैं। हालांकि पूजा की विधि, व्रत खोलने का तरीका और अर्पित की जाने वाली सामग्री अलग-अलग परिवारों तथा क्षेत्रों में उनकी पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए तीजड़ी की पूजा-विधि को एक ही तरीके तक सीमित मानना उचित नहीं होगा।

सिंधी संस्कृति और परंपरा से जुड़ा पर्व

तीजड़ी केवल व्रत का अवसर नहीं बल्कि सिंधी सांस्कृतिक परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने वाला पर्व भी है। पर्व के दौरान परिवारों में पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन होता है और महिलाएं एक-दूसरे के साथ मिलकर इसकी तैयारियां करती हैं। मेहंदी, पूजा, कथा और चंद्रमा को अर्घ्य देने जैसी परंपराएं इस पर्व को सिंधी समाज की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती हैं।
सिंधी समाज के लिए तीजड़ी का महत्व इस बात में भी है कि यह पर्व परिवार और दांपत्य जीवन की मंगलकामना के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करता है। बदलते समय के साथ पर्व मनाने के तरीकों में बदलाव आया है, लेकिन इसकी मूल धार्मिक और सांस्कृतिक भावना अनेक सिंधी परिवारों में आज भी बनी हुई है।
अलग पहचान रखता है तीजड़ी पर्व
तीजड़ी का संबंध भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया से होने के कारण इसे भारत के कुछ अन्य क्षेत्रों में मनाई जाने वाली कजरी तीज के साथ एक ही तिथि पर देखा जाता है। हालांकि सिंधी समाज में इसे अपनी विशिष्ट परंपराओं के साथ तीजड़ी के नाम से मनाया जाता है। उपलब्ध सिंधी सांस्कृतिक स्रोत भी तीजड़ी को सिंधी समाज की अपनी पर्व परंपराओं में शामिल करते हैं।
31 अगस्त 2026 को तीजड़ी पर्व के अवसर पर सिंधी परिवारों में व्रत, पूजा-अर्चना और पारंपरिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ सिंधी समाज की सांस्कृतिक विरासत, पारिवारिक मूल्यों और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को भी जीवंत बनाए रखने का अवसर है।

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