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कहां खो जाते हैं पुराने सैटेलाइट? जानिए 'ग्रेवयार्ड ऑर्बिट' और अंतरिक्ष के अनोखे 'कब्रिस्तान' का रहस्य

वहीं, दूसरा तरीका ऊंची कक्षाओं जैसे जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के लिए है। यहां सैटेलाइट को पृथ्वी की ओर वापस लाने के लिए बहुत ज्यादा ईंधन चाहिए। इसलिए इंजीनियर उन्हें और दूर, 'ग्रेवयार्ड ऑर्बिट' या 'कब्रिस्तान वाली कक्षा' में भेज देते हैं। यह कक्षा सामान्य जियोस्टेशनरी ऑर्बिट से 200-300 किलोमीटर या इससे ज्यादा ऊपर होती है, लगभग 36 हजार किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर होती है। यहां सैटेलाइट सुरक्षित रहते हैं, सक्रिय सैटेलाइट से टकराव का खतरा कम होता है। ये सैटेलाइट हजारों साल तक वहीं घूमते रह सकते हैं।
सवाल यह भी है कि आखिरकार पुराने सैटेलाइट हटाना जरूरी क्यों है? अमेरिकी स्पेस एजेंसी के अनुसार, आज पृथ्वी की कक्षा में कई सक्रिय सैटेलाइट हैं, साथ ही लाखों टुकड़े कबाड़ या स्पेस डेब्री हैं। ये टुकड़े काम कर रहे सैटेलाइट या अंतरिक्ष यानों से टकरा सकते हैं। एक टक्कर से और ज्यादा टुकड़े बनते हैं, जो और टक्कर पैदा करते हैं यह चेन रिएक्शन 'केसलर सिंड्रोम' या 'केसलर इफेक्ट' कहलाता है। अगर यह शुरू हुआ तो कुछ कक्षाएं इस्तेमाल के लायक नहीं रहेंगी, संचार, जीपीएस, मौसम पूर्वानुमान सब प्रभावित होंगे।
--आईएएनएस
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