Baran Tourism: Explore the Hidden Heritage, Temples, Forts and Wildlife of Rajasthan-m.khaskhabar.com
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Oct 9, 2026 1:39 am
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   राजस्थान और हरियाणा सरकार से विज्ञापनों के लिए मान्यता प्राप्त
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बारां में छिपी है राजस्थान की अनदेखी खूबसूरती, पर्यटकों को खींचते हैं जंगल, मंदिर और किले

khaskhabar.com: मंगलवार, 11 अगस्त 2026 08:53 AM (IST)
राजस्थान का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के मन में जयपुर के महल, उदयपुर की झीलें, जैसलमेर का मरुस्थल और जोधपुर के किले उभरते हैं। लेकिन राजस्थान की असली खूबसूरती केवल इन प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों तक सीमित नहीं है। हाड़ौती अंचल में स्थित बारां ऐसा ही एक जिला है, जहां इतिहास, धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सुंदरता, वन्यजीवन और प्राचीन स्थापत्य एक साथ देखने को मिलता है। यहां घने जंगलों के बीच खड़े पुराने किले हैं तो नदियों के किनारे बसे मंदिर और शांत प्राकृतिक स्थल भी हैं। बारां की खासियत यह है कि यहां घूमने के लिए आने वाले पर्यटकों को राजस्थान का एक अलग रूप देखने को मिलता है। यहां का भूगोल अरावली और हाड़ौती क्षेत्र की प्राकृतिक विशेषताओं से प्रभावित है। बारां और उसके आसपास के क्षेत्र में प्राचीन मंदिरों से लेकर मुगलकालीन स्थापत्य, ऐतिहासिक दुर्ग, वन क्षेत्र, जलस्रोत और धार्मिक स्थल मौजूद हैं। यदि आप राजस्थान में किसी अपेक्षाकृत कम चर्चित लेकिन विविधता से भरपूर स्थान की तलाश कर रहे हैं तो बारां को अपनी यात्रा सूची में शामिल किया जा सकता है।
भंडदेवरा मंदिर में दिखती है खजुराहो शैली की झलक

बारां शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर रामगढ़ क्षेत्र में स्थित भंडदेवरा मंदिर यहां के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह प्राचीन मंदिर अपनी स्थापत्य शैली के कारण विशेष आकर्षण रखता है। मंदिर का निर्माण लगभग दसवीं शताब्दी के आसपास का माना जाता है और इसकी वास्तुकला में खजुराहो शैली की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।
इसी कारण इसे राजस्थान का छोटा खजुराहो भी कहा जाता है। मंदिर एक छोटे जलाशय के किनारे स्थित है, जिससे इसके आसपास का प्राकृतिक वातावरण और भी मनोहारी दिखाई देता है। प्राचीन शिल्प, पत्थरों पर की गई नक्काशी और शांत वातावरण इसे इतिहास तथा स्थापत्य में रुचि रखने वाले यात्रियों के लिए खास बनाते हैं।

शाहाबाद दुर्ग में इतिहास और जंगल का अनोखा मेल

बारां से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित शाहाबाद दुर्ग हाड़ौती क्षेत्र के महत्वपूर्ण दुर्गों में शामिल है। घने वन क्षेत्र के बीच ऊंचाई पर स्थित यह दुर्ग अपने आसपास के प्राकृतिक वातावरण के कारण भी आकर्षित करता है। इसका निर्माण चौहान राजपूत शासक मुकुटमणि देव से जोड़ा जाता है और इसे लगभग 16वीं शताब्दी का माना जाता है।
दुर्ग के चारों ओर कूंडा कोह की घाटी का प्राकृतिक विस्तार दिखाई देता है। इतिहास के अनुसार कभी इस किले की सुरक्षा के लिए बड़ी संख्या में तोपें रखी गई थीं। इनमें एक तोप की लंबाई लगभग 19 फुट बताई जाती है। मुगल सम्राट औरंगजेब के भी कुछ समय तक यहां रहने का उल्लेख मिलता है। इतिहास और प्राकृतिक दृश्य दोनों को एक साथ देखने के इच्छुक यात्रियों के लिए यह स्थान खास अनुभव दे सकता है।
शाहाबाद की शाही जामा मस्जिद

शाहाबाद क्षेत्र में स्थित शाही जामा मस्जिद भी ऐतिहासिक और स्थापत्य दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसका निर्माण मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल से जोड़ा जाता है। इसकी वास्तुकला पर दिल्ली की जामा मस्जिद की शैली का प्रभाव दिखाई देता है।
मस्जिद के विशाल स्तंभ और बारीक नक्काशी वाले मेहराब इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल हैं। शांत वातावरण में खड़ी यह ऐतिहासिक इमारत शाहाबाद के समृद्ध अतीत की कहानी कहती है और क्षेत्र की स्थापत्य विरासत को समझने का अवसर देती है।
परवन नदी के किनारे बसा शेरगढ़ दुर्ग
बारां से करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित शेरगढ़ दुर्ग भी जिले के प्रमुख ऐतिहासिक आकर्षणों में शामिल है। परवन नदी के किनारे स्थित यह दुर्ग रणनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता था। अलग-अलग समय में विभिन्न राजवंशों का यहां शासन रहा।
इस दुर्ग का पुराना नाम कोशवर्धन बताया जाता है। बाद में शेरशाह सूरी के अधीन आने के बाद इसका नाम शेरगढ़ पड़ने की मान्यता है। यहां मिले एक अभिलेख का संबंध 790 ईस्वी से बताया जाता है, जो इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास की ओर संकेत करता है। नदी, पहाड़ी क्षेत्र और पुराने दुर्ग का मेल इसे इतिहास प्रेमियों के साथ-साथ फोटोग्राफी पसंद करने वाले लोगों के लिए भी आकर्षक बनाता है।
शेरगढ़ अभयारण्य में वन्यजीवन का अनुभव

शेरगढ़ गांव के आसपास स्थित शेरगढ़ अभयारण्य प्रकृति प्रेमियों के लिए बारां के सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। बारां से लगभग 65 किलोमीटर दूर यह क्षेत्र वनस्पतियों और वन्यजीवों की विविधता के लिए जाना जाता है।
यहां विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों के साथ कई दुर्लभ वनस्पतियां भी देखने को मिलती हैं। बाघ, भालू और तेंदुए जैसे वन्यजीव इस क्षेत्र के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हैं। घने प्राकृतिक वातावरण और वन्यजीवन के कारण यह स्थान प्रकृति तथा वन्यजीव छायांकन में रुचि रखने वाले पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित कर सकता है।
सीताबाड़ी में धार्मिक आस्था के साथ प्राकृतिक शांति

बारां से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित सीताबाड़ी धार्मिक आस्था और प्राकृतिक वातावरण का सुंदर संगम है। यहां सीता और लक्ष्मण से जुड़े कई मंदिर हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह वह स्थान है जहां भगवान राम और सीता के पुत्र लव और कुश का जन्म हुआ था।
सीताबाड़ी में कई प्राचीन कुंड भी हैं, जिनमें वाल्मीकि कुंड, सीता कुंड, लक्ष्मण कुंड और सूर्य कुंड प्रमुख माने जाते हैं। यहां प्रतिवर्ष मई-जून के दौरान सीताबाड़ी मेले का आयोजन होता है। क्षेत्र का सहरिया जनजातीय समुदाय के साथ गहरा संबंध होने के कारण इस मेले को सहरिया समुदाय के कुंभ के रूप में भी जाना जाता है।
तपस्वियों की बगीची में पहाड़ों के बीच सुकून

शाहाबाद के पास स्थित तपस्वियों की बगीची उन लोगों के लिए बेहतर जगह है जो पर्यटन के दौरान भीड़भाड़ से दूर कुछ समय शांति में बिताना चाहते हैं। चारों ओर पहाड़ियों का प्राकृतिक दृश्य इस स्थान को आकर्षक बनाता है।
कहा जाता है कि कभी यहां पान की खेती बड़े स्तर पर होती थी और आज भी उसके कुछ अवशेष देखे जा सकते हैं। यहां स्थित विशाल शिवलिंग भी पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करता है। प्राकृतिक वातावरण और धार्मिक आस्था के कारण यह जगह परिवार के साथ कुछ समय बिताने के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
काकूनी में प्राचीन मंदिरों की विरासत
बारां से करीब 85 किलोमीटर दूर परवन नदी के किनारे स्थित काकूनी प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है। यहां जैन, वैष्णव और भगवान शिव से जुड़े कई मंदिरों के अवशेष मौजूद हैं। इनमें से कुछ मंदिरों का इतिहास आठवीं शताब्दी तक पहुंचता है।
काकूनी से प्राप्त कई प्राचीन मूर्तियों को सुरक्षित रखने के लिए कोटा और झालावाड़ के संग्रहालयों में रखा गया है। यहां भीमगढ़ दुर्ग के अवशेष भी देखे जा सकते हैं, जिसका संबंध राजा भीमदेव से जोड़ा जाता है। यह क्षेत्र राजस्थान की प्राचीन धार्मिक और स्थापत्य विरासत को करीब से समझने का अवसर देता है।
सोरसन में पक्षियों की दुनिया
बारां और कोटा क्षेत्र के आसपास स्थित सोरसन घासभूमि पक्षी प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण रखती है। लगभग 41 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह वन्य क्षेत्र झाड़ियों, जलस्रोतों और विभिन्न प्रकार के पक्षियों के लिए जाना जाता है।
यहां अलग-अलग मौसम में अनेक स्थानीय और प्रवासी पक्षियों को देखा जा सकता है। सर्दियों के दौरान बाहर से आने वाले पक्षियों की संख्या बढ़ जाती है। विभिन्न प्रकार के बत्तख, बटेर, तीतर, बुलबुल, बया, जलपक्षी और दूसरे पक्षी इस क्षेत्र की जैव विविधता को समृद्ध बनाते हैं। काले हिरण और चिंकारा जैसे वन्यजीव भी यहां देखे जा सकते हैं।
सोरसन माता मंदिर और अखंड ज्योति
बारां से करीब 20 किलोमीटर दूर सोरसन गांव में स्थित सोरसन माताजी मंदिर को ब्रह्माणी माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह धार्मिक स्थल स्थानीय लोगों की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है।
मंदिर में अखंड ज्योति को लेकर विशेष मान्यता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार यह ज्योति कई शताब्दियों से लगातार जल रही है। शिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष मेले का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
नाहरगढ़ दुर्ग की मुगलकालीन स्थापत्य शैली
बारां से लगभग 73 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नाहरगढ़ दुर्ग लाल पत्थरों से निर्मित प्रभावशाली ऐतिहासिक संरचना है। इसकी वास्तुकला में मुगलकालीन शैली का प्रभाव दिखाई देता है। दुर्ग का आकार और आसपास का प्राकृतिक वातावरण इसे देखने आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करता है।
इतिहास और वास्तुकला में रुचि रखने वाले लोगों के लिए यह स्थान बारां की यात्रा के दौरान एक महत्वपूर्ण पड़ाव हो सकता है।
बिलासगढ़ और कन्या दह की मार्मिक कहानी
बारां शहर से लगभग 45 किलोमीटर दूर किशनगंज क्षेत्र में स्थित बिलासगढ़ कभी एक विकसित नगर के रूप में जाना जाता था। आज यहां जंगल के बीच पुराने नगर के अवशेष दिखाई देते हैं। इस स्थान से जुड़ी एक लोककथा इसे मुगलकालीन इतिहास से जोड़ती है।
मान्यता के अनुसार बिलासगढ़ की खींची राजवंश की राजकुमारी की सुंदरता से प्रभावित होकर औरंगजेब ने उसे अपने पास बुलाने का आदेश दिया था। राजकुमारी ने इसे स्वीकार करने के बजाय मृत्यु को चुना। जिस स्थान पर उसने अपना जीवन समाप्त किया, उसे बाद में कन्या दह कहा जाने लगा। इसके बाद मुगल सेना द्वारा बिलासगढ़ को नष्ट किए जाने की कथा प्रचलित है। हालांकि इस कथा से जुड़े विवरणों को स्थानीय मान्यता और इतिहास के संदर्भ में अलग-अलग तरह से देखा जाता है।
कपिलधारा का प्राकृतिक झरना
बारां से लगभग 50 किलोमीटर दूर कपिलधारा अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यहां मौजूद जलप्रपात और उसके पास स्थित गौमुख पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण हैं। वर्षा ऋतु में आसपास की हरियाली और पानी की बढ़ी हुई मात्रा इस स्थान की सुंदरता को और बढ़ा देती है।
प्रकृति के बीच कुछ समय बिताने और शांत वातावरण का आनंद लेने वालों के लिए कपिलधारा बारां क्षेत्र में घूमने का अच्छा विकल्प हो सकता है।
गूगोर दुर्ग और परवती नदी का दृश्य
छबड़ा कस्बे से करीब आठ किलोमीटर दूर गूगोर गांव में स्थित गूगोर दुर्ग एक पहाड़ी टीले पर बना है। परवती नदी के किनारे इसकी स्थिति इसे विशेष प्राकृतिक सौंदर्य प्रदान करती है।
दुर्ग और नदी के आसपास का शांत वातावरण उन यात्रियों को पसंद आ सकता है जो ऐतिहासिक स्थलों के साथ प्राकृतिक दृश्य भी देखना चाहते हैं।

हाड़ौती की विरासत को समझने का अवसर

बारां में स्थित हाड़ौती पैनोरमा क्षेत्र के इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्थल है। गजनपुरा के पास कोटा मार्ग पर स्थित यह केंद्र कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बरां क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को एक साथ प्रस्तुत करने का प्रयास करता है।
हाड़ौती अंचल के इतिहास, राजवंशों और सांस्कृतिक परंपराओं को जानने की इच्छा रखने वाले पर्यटकों के लिए यह स्थल यात्रा को अधिक जानकारीपूर्ण बना सकता है।
रामगढ़ माता मंदिर और धार्मिक परंपराएं

रामगढ़ क्षेत्र में पहाड़ी के ऊपर स्थित रामगढ़ माता मंदिर का ऐतिहासिक महत्व बताया जाता है। इसका निर्माण झाला जालिम सिंह से जोड़ा जाता है। मंदिर परिसर में किसनाई माता और अन्नपूर्णा देवी के मंदिर भी मौजूद हैं।
यह मंदिर अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं के कारण भी चर्चा में रहता है। यहां अलग-अलग देवियों को अलग प्रकार का प्रसाद चढ़ाने की परंपरा बताई जाती है। यही विशेषता इसे बरां के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग बनाती है।
रामगढ़ गड्ढा: धरती पर उल्कापिंड के प्रभाव का निशान

बारां से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित रामगढ़ गड्ढा भूगोल और विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए बेहद रोचक स्थल है। इसे उल्कापिंड के धरती से टकराने के कारण बने प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखा जाता है।
इसकी चौड़ाई लगभग साढ़े तीन किलोमीटर बताई जाती है और इसके निर्माण को हजारों वर्ष पहले हुई उल्कापिंडीय टक्कर से जोड़ा जाता है। भारत में ज्ञात उल्कापिंड प्रभाव क्षेत्रों में इसका विशेष महत्व है और इसे राष्ट्रीय महत्व का भूवैज्ञानिक स्मारक घोषित किया गया है। राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत के बीच ऐसा प्राकृतिक भूवैज्ञानिक स्थल बरां को पर्यटन की दृष्टि से और खास बनाता है।
बांसथूनी मंदिर में प्राचीन शिल्पकला

बारां से करीब 24 किलोमीटर दूर शाहाबाद मार्ग पर स्थित बांसथूनी का प्राचीन मंदिर भी देखने लायक है। इसका निर्माण लगभग नौवीं से दसवीं शताब्दी के बीच का माना जाता है। मंदिर के स्तंभों और तोरणों पर की गई नक्काशी इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है।
मंदिर के बाहर भगवान विष्णु के वराह अवतार की शिल्पाकृति भी देखने को मिलती है। प्राचीन मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला में रुचि रखने वाले यात्रियों के लिए यह स्थान खास महत्व रखता है।
बारां राजकीय संग्रहालय में इतिहास से साक्षात्कार

बारां का राजकीय संग्रहालय जिले की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्थान है। संग्रहालय में प्राचीन मूर्तियों, चित्रों, हथियारों और सजावटी वस्तुओं का संग्रह रखा गया है।
इसके अलावा आसपास के मंदिरों और किलों से जुड़ी सामग्री भी यहां देखने को मिलती है। बारां घूमने के दौरान यदि आप केवल प्राकृतिक और ऐतिहासिक स्थल देखने के बजाय क्षेत्र के अतीत को व्यवस्थित तरीके से समझना चाहते हैं तो संग्रहालय आपकी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
बारां क्यों है खास

बारां की सबसे बड़ी खूबी इसकी विविधता है। यहां एक ही यात्रा में प्राचीन मंदिर, ऐतिहासिक किले, धार्मिक स्थल, वन्यजीव क्षेत्र, पक्षी अभयारण्य, जलप्रपात, नदियां और भूवैज्ञानिक विरासत देखी जा सकती है। राजस्थान के दूसरे लोकप्रिय पर्यटन शहरों की तुलना में बरां अपेक्षाकृत शांत है, इसलिए यहां घूमने का अनुभव अधिक सहज और स्थानीय संस्कृति के करीब महसूस हो सकता है।
विशेषकर वर्षा ऋतु में बारां और आसपास के वन क्षेत्र हरियाली से भर जाते हैं। जलप्रपात और नदी क्षेत्र भी इस दौरान अधिक आकर्षक दिखाई देते हैं। वहीं सर्दियों का मौसम पक्षी दर्शन और खुले प्राकृतिक क्षेत्रों में घूमने के लिए बेहतर माना जा सकता है।
यदि आप राजस्थान की ऐसी यात्रा करना चाहते हैं जिसमें केवल महलों और किलों के बजाय इतिहास, प्रकृति, धर्म और वन्यजीवन का मेल देखने को मिले, तो बारां एक ऐसा गंतव्य है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। हाड़ौती की यह धरती राजस्थान के उस रूप से परिचित कराती है, जो अभी भी बड़े पर्यटन मानचित्र पर अपेक्षाकृत कम चर्चित है, लेकिन अनुभव के लिहाज से बेहद समृद्ध है।

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